जेकर गंऊंआ से नाता टूटि गईल
ओकर जिंदगी त कहेला बेकरवे बाs
जे भी खेतवन में कबहूं उतरल नाहीं
ओकर धरती पर आइल भारवे बाs।
जब माटी के खुशबू समाइल नाहीं
त ओकर जिनगिए बेमरिए बाs
जब जाने नाहिं कि गऊंआ का ह
त जियाने ऊ सगरो उमिरिए बाs।
आई के बैठs कबो तू पिपरा तरे
तबे जनबs कि कईसन बयरिये बाs?
जे भी होरहा आ चटनी जानल नाहिं
ओके महुअर के पूछल भुलवने बाs।
आम के बगईचा में खटिया बिछल
आ दुपहरिये में ओकर टप टप चुअल
कबो खिरिया तरे या जामुन तरे
पता ना चलल कईसे जिनगी कटल।
जे जाने ना गईया के रोटी दिहल
जे जाने ना दुअरा गौरैया बैठल
जे नहाईल कबो ना कूआं के जल
ओके शीतल बतावल सपनवे बा।
जे जाने ना कोईलिया के गावल का हs
जे जाने ना सरसो के पीयर खिलल
जे पीयल नाहिं कचरस ऊंख के
ओके मीठा बतावल बेकारे बाs।
नवका चिऊरा के ऊपर सजावल दही
थरिया में सजि के कतहूं आईल कहीं
ओपर मिट्ठा के लाली बिछावल रहे
अईसन सपनो में कबो ना मिली कहीं।
गांव दुअरा छूटल आ बोली छूटल
आपन माटी पे रहे जे गुमनवो हटल
आपन देसवा के माटी त अपने ह
अब त यादो करे के चलनवो हटल।
शहरिया में आई पहचानो भुलल
आ पुरखन के सगरी वचन भूलल
लेईके लंपट अंग्रेजन के चाल चलन
तोके ‘वत्सल’ से सगरो रचनवो भूलल।
जेकर गंऊंआ से नाता टूटि गईल
ओकर जिंदगी त कहेला बेकरवे बाs
जब माटी के खुशबू समाइल नाहीं
तब सगरो जिनिगिए बेमरिए बाs।