कविता जा रही है
पुस्तकें भी जा रही हैं
तुमको हो गई आदत
अब मसाले की।
संस्कृति भी जा रही है
धर्म भी जा रहे हैं
फिक्र किसको है
अब रीति-रिवाजों की?
गीत की सांस टूटी
कथाकारी तिरस्कृत है
तुमको हो गई है आज
चिंता बस निवाले की।
लोक भाषाएं हमारी
गुड़ की चाशनी सी
तुमको हो गई आदत
अलग सा गुनगुनाने की।
रचना सिमटकर पुस्तकों में
चंद सांसे गिन रही है
तुमको हो गई आदत
नजरें चुराने की।
सभ्यताएं मिट गई कितनी
इसी तरह, धीरे धीरे
तुमको हो गई आदत
सब कुछ भुलाने की।