Tagvachaspati vatsal

सुधर जाइए

अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।

देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।

आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।

नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।

यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।

जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।

तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।

सब चले गए

सब चले गएजितने थे…नेह के, स्पर्श केताप के, संघर्ष केप्रतिबिंब चले गए। वो छोटा सा घरौंदाक्षिति परमिट्टी का चूल्हाकुछ सोंधा सोंधा साखदर कर बह गया जोबारिश के थपेडों में कभी का। वो मां की हथेली और आंचलजो हमे था सिक्त करतावो दादी, खुद कहानी बन गईंलोरी सुना करपोते के सिर पर फिर रहे वो हाथबाबा के, कुछ खुरदरे सेउंगलियां जो सिंक गईं होरहा लगातेबाप के कंधे, कराते जो सवारीपीढियों का एक होना परस्परजूझना...

रेत के शहर में

नया सा पुष्प किसी भी डाल परनया पल्लव किसी भी टहन परहरी सी दूब मृदा की छाल परउगेगी क्या रेत के शहर में? प्रेम की किरण मन के क्षितिज परनई मुस्कान किसी के अधर परनया संगीत किसी भी ताल परसजेगा क्या रेत के शहर में? मैं खुद सृष्टा हूं ऐसे तंत्र कामैं खुद दोषी हूं भूले मंत्र कामनुज से मनुज बिल्कुल विलग सा हैफलेगा क्या रेत के शहर में? कैसे परिजन, क्या कुटुंब की कल्पनाबड़ों का संग, धर्म की अल्पनासभी भूले...

महफिल

कहीं सूरज दिखा दिया हमनेकहीं पर शाम कर डालीबस अपने चंद शेरों सेहर महफिल गुलाम कर डाली। हर दिन फूल खिले मिलते हैंहर एक रात रातरानी हैजब से तुम पास मेरे बैठ गएअब तो दुश्मन भी गले मिलते हैं। तेरे ही नाम जिंदगी कर लीतुम्हें ही चारागर सा मान लियाजब अंधेरों से मुलाकात हुईतुझसे ही रोशनी कर ली। प्यार का फलसफा ही ऐसा हैमेरे गीतों में आशनाई हैआधा मिसरा ही कहा है मैंनेउसके होठों पर हंसी आई है। एक दिन गिरा...

ग़ज़ल

तुम ग़ज़ल बन गई हो हमारे लिएगुनगुनाता जिसे मैं हूं हर पल प्रियेलिखता मैं जो भी तुम्हें सोचकरतुम शग़ल बन गई हो हमारे लिए। मधुप बन तलाशा करूं मैं जिसेतुम कमल बन गई हो हमारे लिएछुअन तेरी शीतल घनी छांव सीचांदनी बन गई हो हमारे लिए। तुम चमन बन गई हो हमारे लिएपुष्प कलियां जहां मुस्कुराती मिलेंकहकशां बन गई आसमां में जहांखो गए जिसमे तारे हजारों प्रिये। तुम जतन बन गई हो हमारे लिएबंध गई है प्रणय डोर तुमसे...

मिठास

वह खत जो तुमने कभी लिखे थेन जाने अब वह कहां धरे हैं?इतने बरसों के बाद हम भीन जाने किस वहमो-गुमां पड़े हैं? तुम अगरचे मिल जो जातेतो पूछते खत में क्या लिखा था?उन मौसमों के रंग क्या थेखिले थे डालों पर फूल कैसे? भुला दिया है हमने कैसेलम्हे जो इतने अजीज मुझको?सोचता हूं अब भी लौट जाऊंउस जगह जहां तुम मुझे मिले थे। जिन रास्तों पर हम चले थेउन रास्तों का क्या बना हैवह दरख़्त क्या हैं अब भी वैसेया वह सिमटकर...

गीत

कोई गीत नया, कोई राग नयागाने का जतन करते रहनासुख दुख के सारे रंगों कोजीने का जतन करते रहना कोई दर्श नया, कोई नाम नयायूं ही नहीं बनता यारोंतुम अपने अच्छे कर्मों कीपहचान सदा बनते रहना। कोई स्वप्न नया, कोई अर्श नयाकब आसानी से हासिल होता?अनजानी इन रातों मेंजगने का जतन करते रहना। उगते सूरज का नाम बड़ाबीती शामों का जिक्र नहींजो दीप तुम्हारे साथ जलेतुम याद उन्हें करते रहना। नूतन करने का द्वार सदातुम्हें...

मधुशाला

रातें कट गई गजलों में मेरीगीतों में दिवस बीत गएतेरी यादों में खो गया जबसेआज कितने बरस बीत गए। छेड़ दिया मन का तार फिरउस राग की तरन्नुम नेतेरी तलाश में फिरते हुएखुशबू के शहर रीत गए। तेरा साथ, रंगीली शामफिर लौटकर न आएगीकोशिशें लाख हों भुलाने कीदिल से अब याद कहां जाएगी? तुम मुझे सोचते होगेकिसी अनजान से शहर मेंमैं कविता में ढूंढता तुमकोतू मेरी मधु है, मधुशाला भी। जो फूलों और कलियों मेंखुशी का रंग...

सियासत

आज तेरी बातों में सियासत है बहुततभी एहसासों में बनावट है बहुत मैं तो अब भी होश मंद रहता हूंआज भी वक्त किताबों में गुजारा है बहुत। दो कदम तो चलो, हम चार कदम चल देंगेआज फिर जगने का इरादा है बहुत। चुपचाप खड़े रहने से अच्छा है मेरा मर जानावैसे भी जिंदगी में आज खतरा है बहुत। मैं तो बस ठोकर से हर दीवार गिरा डालूंआज इन दीवारों में शीशा है बहुत। जूझना होगा ही आज सोचा है बहुतअब तलक तो हमने बचाया है बहुत।...

गवारा न था

झूठ के साथ चलना गवारा न थाउसके जलसे में कोई हमारा न था। जिगर पर नए घाव फिर से हुएहमें आह भरना गवारा न था। वह कब तक चलेगा यूं ही शान सेउस महकमे से रिश्ता हमारा न था। हमने देखा बहुत झूठ की फ़र्द कोपर सबूतों का कोई सहारा न था। वह कागज की कश्ती कहां जाएगीउसने सच को कहीं भी पुकारा न था। झूठ की हरकतें बढ़ गई आजकलउसकी ज़िंदाँ में मेरा गुजारा न था। सुबह होगी मगर लोग पछता रहेझूठ को वक्त रहते सुधारा न था।...

Get in touch

Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.