Tagvachaspati vatsal

इंतजाम

शक-ओ-शुबहा पनप रहे हो जहांवहां जाने का दिल नहीं करताहोश की मिल्कियत को अबदिल लगाने का जी नहीं करता। कोई भी बच नहीं सकताइस माहौल की मक्कारी सेजहां पर सच के दावेदारों मेंतरफदारी हद से ज्यादा है। अब चेहरे साफ नहीं दिखतेजो कभी आईने से लगते थेआज हक के तलबगारो मेंनाउम्मीदी हद से ज्यादा है। साहिबे-दरबार अब हम परकुछ मेहरबान हद से ज्यादा हैमेरा कलाम मुझसे कहता हैयहां अंधेरा हद से ज्यादा है। जो भी हो अंजाम...

सफर

जिंदगी के सफर में कोई रात दिनकाम करता रहा कोई सोता रहामंजिलों ने स्वयं चुन लिया रास्ताकोई पाता रहा कोई खोता रहा। सदा प्यास चलकर कुएँ तक गईसदा कोशिशें बन गई रोशनीसदा कर्म को ही मिली मंजिलेकोई जगता रहा कोई सोता रहा। जो सदा कंटको से उलझता रहावह इबारत नई एक लिखता रहासफर की थकन जिसने माना नहींवह सदा ही शिखर पर पहुंचता रहा। आशा निराशा के सोपान कितनेयूं आकर मनुज को तराशा करेंजिंदगी को निभाना बड़ी बात...

मिठास

वह खत जो तुमने कभी लिखे थेअब न जाने कहां धरे हैं?इतने बरसों के बाद हम भीजाने किस वहमो-गुमां पड़े हैं? तुम अगरचे मिल जो जातेपूछते खत में क्या लिखा था?उन मौसमों के रंग क्या थेखिले थे डालों पर फूल कैसे? भुला दिया है हमने कैसेलम्हे जो इतने अजीज मुझकोकि अब जो सहसा लौट जाऊंउस जगह कुछ बचा नहीं है। जिन रास्तों पर हम चले थेउन रास्तों का क्या बना है?वह दरख़्त क्या हैं अब भी वैसेया वह सिमटकर ठूंठ से है? जो...

ऐ जिंदगी

ऐ जिंदगी, दो चार कदम साथ तो चलहोने दे उनसे अभी और मुलाकात तो चल। अभी-अभी तो उनके पास आकर बैठा हूंखुल जाएं जरा ठीक से जज्बात तो चल। मिले हैं इतने बरस बाद कि अब याद नहींहो जाए जरा शाम से अब रात तो चल। अभी तो आए है यादों के चंद झोंके हीहो जाए जरा आंखों से बरसात तो चल। हमारे प्यार का मधुमास अभी आया हैहो जाए उन्हें ठीक से एहसास तो चल। यही वक्त है अब दिल के जवां होने काउनकी खुशबू में मुझे और रवां होने...

मुस्कान

राह पर प्रस्थान फिर फिरमार्ग का अनुमान फिर फिरधूप हो या छांव फिर फिरगेह का निर्माण फिर फिर। कर नमन इन बाजुओं कास्वेद का कर दान फिर फिरकर्म पथ पर फिर भरोसाप्रारंभ हो श्रमदान फिर फिर। बस यही तो जिंदगी हैप्राप्ति का अरमान फिर फिरलक्ष्य पर संधान फिर फिरप्रेम का सम्मान फिर फिर। गर्दिशों की शाम जो होसुन ग़ज़ल की तान फिर फिरमरू हो या गुलशन कोई होनीड़ का निर्माण फिर फिर। ले मधु का जाम फिर फिरकर खुशी का...

उम्मीद

तुमसे मिलने की उम्मीद करता रहूंसाथ चलने की उम्मीद करता रहूंलोग कहते हैं तुम अब समझने लगेमन के मिलने की उम्मीद करता रहूं। अब तलक तो रही दूरियां दरमियांशायद मुझसे बड़ी हैं वे मजबूरियांतुम बंधन कभी भी छुड़ा ना सकेतुम दिलासे भी मुझको दिलाना सके यूं तो आए कई पल मुलाकात केबंद खुल ना सके अपने जज्बात केहै किया फैसला की कह देंगे हममन में जो भी छुपे हैं कमल भाव के। तुम जो चाहो तो कुछ मशवरे तुमको दूंरोज...

हर पल को ग़ज़ल कर दूं

यह बहुत है, तुम साथ हो मेरेजीवन में मिठास छलक आई हैवरना घर में बैठकर तन्हाहर पल का वजन गिनता। तुम दिन के हो उजालेरातों की महक तुम होहोठों पर मुस्कुराहट कीबस एक वजह तुम हो। कैसे यह समय बीतामालूम नहीं मुझकोअभी तो हम चले थेदो चार कदम मिलकर। अभी तो इश्क सीखा हैमजलिस के माहिरों सेबाकी है आजमानाकितने ही मशवरों को। अभी तो फलसफे भीसमझ में नहीं आएबस इतना जानता हूंतुम हो तो जिंदगी है। वक्त को थाम लूं...

नाता टूटि गईल

जेकर गंऊंआ से नाता टूटि गईलओकर जिंदगी त कहेला बेकरवे बाsजे भी खेतवन में कबहूं उतरल नाहींओकर धरती पर आइल भारवे बाs। जब माटी के खुशबू समाइल नाहींत ओकर जिनगिए बेमरिए बाsजब जाने नाहिं कि गऊंआ का हत जियाने ऊ सगरो उमिरिए बाs। आई के बैठs कबो तू पिपरा तरेतबे जनबs कि कईसन बयरिये बाs?जे भी होरहा आ चटनी जानल नाहिंओके महुअर के पूछल भुलवने बाs। आम के बगईचा में खटिया बिछलआ दुपहरिये में ओकर टप टप चुअलकबो खिरिया...

ये उलझनों के साए

ये उलझनों के साए जब भी हैं मन पे छाएहैं मुश्किलें सिखातीं कि कैसे कदम बढ़ाएं? अंधेरी सी उस डगर पर हो कोई न साथ तेरेफिर भी है राह मुमकिन जगनुओं ने हैं बताए। डरना नहीं कभी तुम अनजाने रास्तों परबस हिम्मतों ने कितने सफर खुशनुमा बनाए। चलना तो होगा सबको हो वसंत या मरू होपर जीतता वही है जो स्वेद में नहाए। बंजर सी रेत पर मैं ये गज़ल लिख रहा हूंहंसकर जो मुझसे कहती आ तुझको आजमाएं? एक शेर मेरा रख लो इस राह...

कादंबरी

इन ऊंचे नीचे रास्तों मेंमंजिलों के वास्तों मेंकोई प्रियतम आन मिलताकोई प्रिय सहसा बिछड़ता। कभी उत्थान का आनंद हैकभी गर्दिशों की शाम हैचलते ही जाना जिंदगी हैपल भर नहीं विश्राम है? मार्ग का आकर्ष सबकोऔर आगे खींचता हैक्षितिज का हर बिंब नूतनकदमों को मेरे तौलता है। हर नदी श्वेतांबरा सीअपनी गति से दर्श देतीएक ताजगी सी जागती हैजब भी कोई पवन चलती। कंटको का क्या भरोसाकब पगों को बेध देंगेखाईयों का क्या...

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.