Tagvatsal

गांव बचा कर रखना

शहर में तो आ गए होपर गांव बचा कर रखनागर्मी यहां बहुत हैतुम छांव बचा कर रखना। वहां लगते थे कभी मेलेयहां रोज ही है मेलातुम इनमें खो न जाओये भाव बचा कर रखना। छलिया हैं सब यहां परये चकाचौंध रोशनी भीउजालों के पीछे छुपकरहै अंधेरों ने रहजनी की। चलना यहां संभलकरलुटते हैं रोज कितनेखाकर हजार धोखे भीस्वभाव बचा कर रखना। माटी ही आदमी हैसोंधी है जिसकी खुशबूयह शहर है बनावटआधार बचा कर रखना। झोली भले रहे...

जो नहीं खिले थे गुल कभी

जो नहीं खिले थे गुल कभीवो भी इस बहार में खिल गएजब तुम हो मुझको आ मिलेमेरे अंदाज ही हैं बदल गए। जो उजाले मेरी राह परकभी भूल कर भी गए नहींवो हैं खुद ही आकर पूछतेकि हम किधर को निकल गए? जो पहले थी आवारगीवो है ताजगी में बदल गईजो भी जिंदगी से मलाल थेवो रफ्ता रफ्ता संवर गए। जो थे सहमे सहमे थके थकेउन हौसलों में उड़ान हैजो भी गमों के दयार थेवो गज़ल बन के निखर गए। अब दश्त क्या, खिजां है क्या?मुझे कोई भी...

दस्तखत

बड़े अधिकारियों के कष्ट कई तरह के होते हैं, कभी दस्तखत में ताकत होने की असहजता उन्हें चैन से सोने नहीं देती तो कभी दस्तखत की ताकत खो जाने का भय उन्हें सालता रहता है । यह दोनों अवस्थाएं बड़ी ही कष्टदायी हैं और इस कारण उनके स्वभाव में एक अलग सी बेचैनी नजर आना स्वाभाविक है। इसलिए बड़े अधिकारियों के साथ कुछ छोटी-मोटी घटनाएं हो जाया करती हैं। साहब एक बड़े संस्थान में अधिकारी थे। आप उन्हें श्रीमान...

पुनर्मूषको भव

महर्षि याज्ञवल्क्य के वंश में आज पहली बार एक पुत्री ने जन्म लिया था। सभी ओर प्रसन्नता थी और महर्षि याज्ञवल्क्य के प्रपौत्र अपनी पुत्री को अपनी गोद में लेकर दुलार रहे थे। उनकी पत्नी सुमेधा भी बहुत प्रसन्न थी क्योंकि महर्षि याज्ञवल्क्य के वैकुंठ जाने के बाद अब जाकर तीसरी पीढ़ी में किसी पुत्री ने जन्म लिया था। महर्षि याज्ञवल्क्य ने तो एक चुहिया को ही अपनी पुत्री बनाकर उसका विवाह किया था, आपको याद ही...

वेलकम टू पाटलिपुत्र

चलिए आज आपको कुछ पुराने दिनों से परिचित कराता हूं। पाटलिपुत्र से तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं अपने प्रिय राज्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यह नाम वहीं से संबंधित है, हां विरोधी पार्टी वाले कभी-कभी इसका नाम जंगलराज से जोड़ देते हैं, यह और बात है। जंगल में मंगल करना कोई हमसे सीखे, और इसके कुछ उदाहरण भी मैं आपको देता हूं। उस दिन मैं अपने गांव से बनारस जाने के लिए निकला था। गांव से थोड़ी दूर एक अन्य...

आदत

कविता जा रही हैपुस्तकें भी जा रही हैंतुमको हो गई आदतअब मसाले की। संस्कृति भी जा रही हैधर्म भी जा रहे हैंफिक्र किसको हैअब रीति-रिवाजों की? गीत की सांस टूटीकथाकारी तिरस्कृत हैतुमको हो गई है आजचिंता बस निवाले की। लोक भाषाएं हमारीगुड़ की चाशनी सीतुमको हो गई आदतअलग सा गुनगुनाने की। रचना सिमटकर पुस्तकों मेंचंद सांसे गिन रही हैतुमको हो गई आदतनजरें चुराने की। सभ्यताएं मिट गई कितनीइसी तरह, धीरे धीरेतुमको...

ये बहुत बड़ी बात है

जहां बगीचे थे, वहां रेगिस्तान हो गएघरों के आसपास कूड़ेदान हो गएतलो-तालाब सूखकर अनजान हो गएखेत खलिहान अब दुकान हो गए। घर घर न रहे, ऊंचे मचान हो गएलिहाज और शर्म बदनाम हो गएमंदिर, जो कभी थोड़ा सुकून देते थेसिमटकर अब गुमनाम हो गए। कोई रहे कहां और जाए कहां आजदरो दीवार सारे इश्तिहार हो गएदुनिया इतनी बदली कब, पता नहीं मुझेदिल के शीशे टूट कर गाहे गराज हो गए। खुली हवा का एक झोंका दूभर हुआ जहांअब कैमरे हैं...

रौशनी

जहां तक रौशनी नहीं जातीवहां भी मेरी गजल जाएहौसले मेरे कम नहीं होगेभले ताउम्र यह सफर जाए। रोज ही एक नए फसाने काअजीब शौक है तुझकोलिख दूं मैं तुझ पर शेर कोईतेरा नकाब ही उतर जाए। चलो कुछ आग छुपी रहने दूंइश्क भी, रंज भी अपनाकुछ दिनों बाद देखेंगेकहां क्या-क्या लिखा जाए? मैं बहुत दूर निकल आयाजैसा उसने मुझसे चाहा थाअब तो पिछला मरहला मुझकोज़रा ज़रा सा ही बसर आए। अब कलम है, चंद गजलें हैंमैं ही उस्ताद हूं...

संसार

यह प्यारा मधुमय सा संसारप्रात खोले है मन का द्वारदिवस भर खुशियों का अंबाररात को तारों में घर बार। क्षितिज जब उगता है सोनानींद छोड़े हैं हर कोनाकूकते कलरव करते खगकिरण से जगमग होता जग। फूल खिल उठते हैं सारेअंगड़ाई लेती हैं कलियांखुशबू फैल रही हर ओरजहां मदमस्त हो गए मोर। सुबह की भीगी यह खुशबूबुलाती मुझको अपने पासपुष्प पर भ्रमरो की अनुगूंजलगता है आया ज्यों मधुमास। फैलती महुए की चादरटपा टप पेड़ों के...

मुकाम

बहता रहा सदा ही नदी की धार में जैसेकुछ हाथ में था ही नहीं पतवार के जैसे। करता रहा सफर एक अनजानी डगर परजिस राह पर कोई न निकला था बसर पर। तिनका हूं मेरे हाथ में कुछ भी तो नहीं हैनजरों में दूर दूर तक कोई भी नही है। बस मान लिया मैने कि तू साथ खड़ा हैतबसे मेरा अंदाजे-बयां सबसे जुदा है। मालूम नहीं पंक्तियां ये कौन लिख रहाचुपचाप खड़ा देखता कागज़ सिमट रहा। कोई गज़ल भी मुझमें है सोचा ही नहीं थाएक गीत कभी...

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.