जहां बगीचे थे, वहां रेगिस्तान हो गए
घरों के आसपास कूड़ेदान हो गए
तलो-तालाब सूखकर अनजान हो गए
खेत खलिहान अब दुकान हो गए।
घर घर न रहे, ऊंचे मचान हो गए
लिहाज और शर्म बदनाम हो गए
मंदिर, जो कभी थोड़ा सुकून देते थे
सिमटकर अब गुमनाम हो गए।
कोई रहे कहां और जाए कहां आज
दरो दीवार सारे इश्तिहार हो गए
दुनिया इतनी बदली कब, पता नहीं मुझे
दिल के शीशे टूट कर गाहे गराज हो गए।
खुली हवा का एक झोंका दूभर हुआ जहां
अब कैमरे हैं हर तरफ ये बहुत बड़ी बात है
हरेक सांस सांस का हिसाब है जहां
कोई शहर में जी गया ये बहुत बड़ी बात है।
सुबह से आधी रात जहां दौड़ता हर कोई
चंद नींदें खरीद ली ये बहुत बड़ी बात है
खुलकर हंसना देर तक देखा नहीं जहां
हम शहर में बस गए, ये बहुत बड़ी बात है।