वह खत जो तुमने कभी लिखे थे
न जाने अब वह कहां धरे हैं?
इतने बरसों के बाद हम भी
न जाने किस वहमो-गुमां पड़े हैं?
तुम अगरचे मिल जो जाते
तो पूछते खत में क्या लिखा था?
उन मौसमों के रंग क्या थे
खिले थे डालों पर फूल कैसे?
भुला दिया है हमने कैसे
लम्हे जो इतने अजीज मुझको?
सोचता हूं अब भी लौट जाऊं
उस जगह जहां तुम मुझे मिले थे।
जिन रास्तों पर हम चले थे
उन रास्तों का क्या बना है
वह दरख़्त क्या हैं अब भी वैसे
या वह सिमटकर ठूंठ से है?
जो गीत तुमने कभी सुनाए
क्या वह अब भी है लबों पर
जो शाम हमने गुजारी हंसकर
क्या वह अब भी सुरमई है?
मुझे मुस्कुरा कर जो तुमने देखा
क्या निगाह अब भी खुशनुमा है?
या वहां पर असर थकन का
माथे पर कुछ शिकन पड़ी हैं?
बहुत भले ही न याद मुझको
अपने अंदर ही बंट गया हूं
कि जो अब है उसे भुला कर
मैं तैयार हूं कि लौट आऊं।
जो जी लिया है जिंदगी में
बाकी भी वैसे कट ही जाती
पर उस खलिश को भुलाऊं कैसे
न जाने तुममें वो बात क्या है?
तुम ही बताओ वो बात क्या है
जो बात तेरी जुल्फ में है
तेरी नजर का सुकून मुझको
कहीं अभी तक मिला नहीं है।
तेरे लबों का गुलाबी जादू
किसी के गीतों में मिला नहीं है
अब जो गीतों में मिला नहीं तो
कोई न समझा मिठास क्या है?