उन वंचितों पर भी जरा कोई गज़ल तो लिख
झोपड़ी का हक जो मारे उस महल पर लिख।
लबों, जुल्फों, सागरों पर शायरी आसान है
ज़ुल्मतों के दौर पर भी एक बहर तो लिख।
भूखे नंगे लोग किस उम्मीद से सजदा करें
अदालतें कानून हों गर बेअसर तो लिख।
चांदनी पर शेर लिख जलती दुपहरी भूलते
सपने जहां पूरे न हों ऐसे बसर पर लिख।
प्याला लिए साकी के साए में थिरकना चाहना
ये भी भला कोई काम है अच्छा अगर तो लिख?
दूसरे की आंख में आंसू का कतरा देखकर
गमगीन भी होता नहीं इंसान गर तो लिख।