न जाने कितने भावों को
कभी शब्द ही मिले नहीं
न जाने कितने गीतों को
कभी राग ही मिले नहीं।
उमड़ कर बदलियां कितनी
बरसी नहीं मरू में भी
न जाने कितने फूलों को
देखा नहीं किसी ने भी।
क्या हिसाब तारों का
जो टूट कर बिखर गए
क्या हिसाब आहों का
मिला कोई भी सिला नहीं।
भ्रमर भी घूम कर लौटे
कभी रस बिना ही उपवन से
कितने ही मृग दिशा खोकर
समूह से बिछड़ गए।
न जाने कितने साधक को
साध्य ही मिला नहीं
जो सदा व्याप्त घट घट में
पास ही दिखा नहीं।
कभी कोई रह गया भूला सा
कोई रह गया प्यासा ही
अव्यक्त रह गया कितना कुछ
जो भी घटा था अंतर में।
ऐसे ही मन कलश कितने
रह गए सदा खाली ही
किसी ने लिखना चाहा भी
उसे शब्द ही मिले नहीं।