शहर में तो आ गए हो
पर गांव बचा कर रखना
गर्मी यहां बहुत है
तुम छांव बचा कर रखना।
वहां लगते थे कभी मेले
यहां रोज ही है मेला
तुम इनमें खो न जाओ
ये भाव बचा कर रखना।
छलिया हैं सब यहां पर
ये चकाचौंध रोशनी भी
उजालों के पीछे छुपकर
है अंधेरों ने रहजनी की।
चलना यहां संभलकर
लुटते हैं रोज कितने
खाकर हजार धोखे भी
स्वभाव बचा कर रखना।
माटी ही आदमी है
सोंधी है जिसकी खुशबू
यह शहर है बनावट
आधार बचा कर रखना।
झोली भले रहे खाली
पहचान बचा कर रखना।
शहर में तो आ गए हो
पर गांव बचा कर रखना।