जो नहीं खिले थे गुल कभी
वो भी इस बहार में खिल गए
जब तुम हो मुझको आ मिले
मेरे अंदाज ही हैं बदल गए।
जो उजाले मेरी राह पर
कभी भूल कर भी गए नहीं
वो हैं खुद ही आकर पूछते
कि हम किधर को निकल गए?
जो पहले थी आवारगी
वो है ताजगी में बदल गई
जो भी जिंदगी से मलाल थे
वो रफ्ता रफ्ता संवर गए।
जो थे सहमे सहमे थके थके
उन हौसलों में उड़ान है
जो भी गमों के दयार थे
वो गज़ल बन के निखर गए।
अब दश्त क्या, खिजां है क्या?
मुझे कोई भी गिला नहीं
अब तेरे इश्के-फ़िराक़ में
मेरे सारे शामों-सहर गए।
जो नहीं खिले थे गुल कभी
वो भी इस बहार में खिल गए।