मां पार्वती को कैलाश पर बहुत दिनों बाद रंगद्वीप का कोई समाचार पत्र मिला था जिसे रुद्र अभी अभी उन्हें दे कर गए थे। प्रथम पृष्ठ पर रंगद्वीप में किसी मंदिर के उद्घाटन का जिक्र था और एक बड़ी ही मनमोहक तस्वीर भी मंदिर की छपी थी। मंदिर का जिक्र आते ही उन्हें जंबूद्वीप के काशी क्षेत्र में बने अपने आराध्य महादेव के मंदिर की याद आई जहां से वह दो वर्ष पूर्व ही होकर आईं थीं। उनकी जिज्ञासा और बढ़ गई और वह गौर से न्यूज़ पढ़ने लगीं। किसी राम जन्मभूमि के उद्घाटन का संदर्भ था और तभी उन्होंने देखा कि बीच की तस्वीर में एक साठ सत्तर साल की उम्र का व्यक्ति प्रभु राम के बाल स्वरूप को उंगली पकड़ा कर कहीं ले जा रहा था। यह देख उन्हें कुछ भी समझ नहीं आया। पीले वल्कल वस्त्रों में राम को बाल स्वरूप में देखकर वह अचंभित हो गई क्योंकि उन्होंने शिवपुराण में महादेव से श्री राम के सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटने की कथा सुनी थी। उस कथा में ऐसे किसी व्यक्ति का कोई जिक्र नहीं था, फिर रंगद्वीप के समाचार पत्र में प्रदर्शित यह व्यक्ति कौन था जो श्री राम के बाल स्वरूप को उंगली पकड़ा कर कहीं ले जा रहा था । क्या विष्णु भगवान ने राम के बाल स्वरूप में फिर से अवतार लिया है? अगर लिया भी है तो उन्हें ज्ञात कैसे नहीं? इस प्रश्न के साथ साथ उन्हें थोड़ी ईर्ष्या भी हो रही थी क्योंकि काशी में बना महादेव का मंदिर इतना बड़ा कदापि नहीं था। श्री राम का यह मंदिर वास्तव में बड़ा भव्य नजर आ रहा था। उन्होंने भगवान शिव का ऐसा कोई मंदिर कहीं नहीं देखा था। अंततः उन्होंने भगवान शिव से अपने प्रश्नों का निराकरण करने का सोचा।
अपनी वाटिका के द्वार पर महादेव उस समय नंदी को कुछ निर्देश दे रहे थे जब मां पार्वती वहां पहुंचीं। उनके अन्य गण आसपास खड़े थे। मां पार्वती के वहां पहुंचते ही महादेव चुप हो गए और उन्होंने उनकी भाव भंगिमा को देखकर यह समझ लिया की कुछ न कुछ मामला गड़बड़ अवश्य है। उन्होंने सहज भाव से पूछा।
“देवी, क्या बात है, आप कुछ परेशान लग रहीं हैं?”
“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है।”
पर महादेव से क्या छुप सकता था, वह तो सर्वज्ञानी थे इसलिए जल्दी से उन्होंने नंदी इत्यादि को वहां से इधर उधर भेज दिया। सभी के चले जाने पर मां पार्वती ने वह समाचार पत्र महादेव के सामने प्रस्तुत कर दिया और बोलीं, “यह देखिए, रंगद्वीप में श्री राम के लिए इतना बड़ा मंदिर बन गया और उसका उद्घाटन निश्चित है, पर आपके लिए कोई ऐसा बड़ा मंदिर कहीं नहीं। इसमें तो आप आमंत्रित भी नहीं हैं नहीं तो समाचार पत्र से सूचना मिलने के पहले ही आप मुझे अवश्य बता देते।” महादेव सब समझ गए, मां पार्वती का मन उस मंदिर की विशालता के बखान को पढ़ कर इतना उद्वेलित हो गया था और उन्हें आज अपनी पुत्री सीता से ही ईर्ष्या होने लगी थी। वह मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। ऐसे विस्मय के क्षण उनके जीवन में कई बार आ चुके थे इसलिए महादेव जरा भी अचंभित नहीं हुए।
उन्होंने मां पार्वती से कहा, “मुझे इस मामले की जानकारी नहीं है, इधर मैं बहुत दिनों से रंगद्वीप पर गया भी नहीं। आप नारद मुनि से पूछ लें, वह इस मंदिर इत्यादि के विषय में आपको सारी जानकारी दे देंगे। कलयुग में तो वैसे भी देवताओं को धरती से दूरी बना लेनी चाहिए, चाहे वह जम्बूद्वीप हो या रंगद्वीप। मां पार्वती नाराज होकर वहां से चली गईं पर अपने प्रश्नों का उत्तर उन्हें अवश्य चाहिए था। इसलिए उन्होंने रुद्र को बुलाकर कहा, “तुम नारद मुनि को जल्दी से जल्दी मेरे पास बुलाओ” मामला गंभीर था। उन्होंने बैकुंठ में देवी लक्ष्मी को फोन मिलाया। काफी देर फोन की घंटी बजती रही पर किसी ने फोन ही नहीं उठाया। वह क्रोधित हो उठीं और उन्हें लगने लगा की जरूर ही उनके साथ कोई षड्यंत्र हो रहा है। उन्हें पक्का विश्वास था कि भगवान विष्णु आमंत्रण पत्र पाते ही देवी लक्ष्मी को लेकर रंगद्वीप पहुंच गए होंगे। इधर शिव पार्वती को कोई आमंत्रण ही नहीं। ऐसा आज तक कभी हुआ ही नहीं था। उन्हें उस तस्वीर वाले के व्यक्ति पर भी क्रोध आ रहा था, न जाने यह कौन व्यक्ति है जो भगवान विष्णु को आमंत्रण देकर महादेव को भूल जाता है?
इधर नारद मुनि को खबर हो गई थी और वह जल्दी जल्दी कैलाश की ओर भागे जा रहे थे। वह मां पार्वती का क्रोध जानते थे अतः विलंब कर कोई श्राप नहीं लेना चाहते थे। जैसे तैसे पहुंचे और हाजिरी लगाई। उनके सामने पड़ते ही मां पार्वती ने उनपर अपने सारे प्रश्नों की झड़ी लगा दी। नारद मुनि मौन, जानते तो वह सब थे पर झगड़ा लगाने में माहिर भी वही थे। मौका कैसे चूकते, बहुत दिनों बाद अवसर मिला था। हां, रंगद्वीप के मंदिर के विषय में वह कुछ जानते नहीं थे क्योंकि कई वर्षों से इन द्वीपों पर प्रदूषण बढ़ने के कारण उनका जाना कम हो गया था, और इधर कोई अवतार भी तो नहीं हुआ था वहां। कहा, “माते, मैं अभी वैकुंठ से होकर आ रहा हूं, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी मुझे वहां नहीं दिखे।”
“और ब्रह्मा जी, वहां की क्या सूचना है?”
“मैं अभी पता कर बताता हूं”, नारद जी यह कह कर अंतर्ध्यान हो गए।
मां पार्वती के क्रोध का कोई ठिकाना नहीं था। उन्हें अपने पिता दक्ष के द्वारा अपने पति का अपमान याद आने लगा था। पर उनकी बात सुनकर महादेव क्यों मौन थे, यह बात उन्हें समझ नहीं आ रही थी। अपमान तो उनका भी हुआ था क्योंकि दो वर्ष पूर्व जम्बूद्वीप के काशी प्रांत में बना मंदिर इस रंगद्वीप के मंदिर से काफी छोटा था। उसकी तो तस्वीर भी बड़ी छोटी सी किसी संन्यासी के साथ छाप दी गईं थी। वह तो काशी का प्रश्न था इसलिए घर की बात मानकर उन्होंने उसे बहुत तूल नहीं दिया था पर इस बार मामला ठीक उल्टा था। इस राम मंदिर के उद्घाटन में श्री राम के आराध्य महादेव को आमंत्रण नहीं, यह तो लगभग अक्षम्य था।
उधर नारद ब्रह्मलोक जा पंहुचे। पंहुंच कर देखा तो विष्णु भगवान ब्रह्मा जी के साथ किसी गहन चर्चा में लीन थे। सामने टेबल पर वही समाचार पत्र खुला हुआ था जो मां पार्वती ने दिखाया था। दोनो देवता चिंतित लग रहे थे।
“नारायण! नारायण! धन्य हैं प्रभु, आप लोग यहां हैं और उधर माता पार्वती कुपित हुई जा रही हैं। “उन्होंने उन दोनों को प्रणाम कर अपनी बात प्रारंभ की।
“क्या हुआ पुत्र, ब्रह्मा जी ने पूछा।”
“आप दोनो रंगद्वीप से इस मंदिर उद्घाटन समारोह में जा रहे हैं यह जान कर मां पार्वती कुपित हैं क्योंकि महादेव को इसका आमंत्रण ही नहीं। और अगर उन्होंने कुछ इधर उधर कर दिया तो प्रलय आ जायेगा, इसलिए मैं चिंतित हूं।”
नारद, शांत हो जाओ, हमें भी इस आयोजन का कोई आमंत्रण पत्र नहीं मिला है, यह तो हमें शेषनाग ने अभी अभी लाकर दिया है। तब से हम भी इसे जानकर चिंतित है कि रंगद्वीप पर क्या हो रहा है। यह राम के बगल में उन्हें उंगली पकड़ा कर ले जाता सफेद दाढ़ी में व्यक्ति कौन है? क्या मर्यादा पुरुषोत्तम राम को भी कोई दिशा निर्देश दे सकता है भला? नारद यह सुनकर शांत तो हुए पर उनका मन अभी भी घबराया हुआ था।
“पर मां पार्वती का क्रोध?”
घबराओ मत वत्स, हम दोनों उनसे मिलने अभी कैलाश जा रहे हैं। तब तक तुम रंगद्वीप से इस व्यक्ति के बारे में सारी सूचना ले आओ कि वहां चल क्या रहा है। हम सभी को वहां की सूचनाओं से अपडेट रहना चाहिए।
नारद के जाने के तुरंत बाद दोनों देवता कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े। साथ में माता लक्ष्मी भी चल पड़ीं जिससे मां पार्वती को तसल्ली हो जाय और उन्हें समझाने में सहूलियत हो सके। उन सभी को कैलाश पर आया देख मां पार्वती का क्रोध शांत हो गया। महादेव तो भोले थे, उन्हें तो वैसे भी कोई समस्या नहीं थी। उन्होंने उनका स्वागत किया और आने का मंतव्य पूछा। आमंत्रण का संशय हल होने पर मां पार्वती माता लक्ष्मी को लेकर अंदर चली गईं और इधर त्रिदेव समस्त जगत की चर्चा में लग गए। काशी के महादेव मंदिर के छोटे होने के प्रश्न को वह लगभग भूल ही गईं थीं।
उधर नारद मुनि लगभग भागते हुए रंगद्वीप पंहुचे। देखा तो वहां सबकुछ कुछ बदल गया था। नए मंदिर बन तो रहे थे पर कुछ पुराने मंदिर बुलडोजर नामक दैत्यों द्वारा ध्वस्त भी किए जा रहे थे। उन्हें उन पुराने मंदिरों के विग्रहों की जरा भी चिंता न थी। सब कुछ लगभग अस्त व्यस्त हो चुका था। बड़े बड़े होर्डिंग्स पर उस दाढ़ी वाले मनुष्य के चित्र टंगे थे और उनके नीचे गारंटी वारंटी कुछ लिखा हुआ था। उस व्यक्ति की उंगली पकड़े बाल रूप में श्री राम का भी चित्र था। नारद मुनि इस व्यक्ति के बारे में जानने को उत्सुक हो उठे। पास ही एक चाय की दुकान पर कुछ लोग बैठे थे। उन्होंने वहां जाकर इस व्यक्ति के बारे में पूछा।
“हे वत्स, इस बड़े चित्र में ये महाशय कौन हैं?” वह आदमी उन्हें ऊपर से नीचे देखने लगा जैसे उन्होंने कोई अपराध कर दिया हो। बोला, “इन्हें नहीं जानते, सेंटिनल आइलैंड से आए हो क्या, देखने से तो साधु लगते हो?”
“नहीं, मैं देवलोक से आया हूं” नारद मुनि ने कहा।
वह हंसने लगा, बोला, “और मैं स्वर्ग लोक से आया हूं, काहे दिमाग खाते हो बाबा, जाओ यहां से, नहीं पता है तो मोबाइल खोलकर गूगल कर लो, पता चल जायेगा। न जाने कहां कहां से चले आते हैं?”
इतना कहकर वह चला गया। देवर्षि नारद वहीं खड़े के खड़े रह गए। उनका कोई प्रश्न हल न हुआ। उन्हें मोबाइल या गूगल के बारे में भी कुछ पता नहीं था। कुछ और आगे बढ़ने पर उन्हें मैदान में कुछ बच्चे खेलते नजर आए। सोचा, बच्चे तो मन के सच्चे होते हैं, अब यही शायद कुछ बता पाएं। उन सभी बच्चों के हाथों में कोई यंत्र था जिसे वह अक्सर देखते रहते और खेलते भी रहते, यानी एक पंथ दो काज। कभी कभी उस यंत्र को कान में लगा कर कुछ बुदबुदाने लगते और कभी उसे अपने आगे कर के मुस्कुराते ओर कुछ “सेल्फी सेल्फी” कहने लगते। उन्हें कुछ भी समझ न आया। एक बच्चे को रोक कर पूछा, “बालक, इस बड़ी तस्वीर में ये व्यक्ति कौन हैं? क्या तुम मुझे कुछ बता सकते हो?” बच्चा चौंका तो अवश्य पर खेल में व्यवधान न आए इसलिए उसने जल्दी से उन्हें अपना यंत्र खोल उस व्यक्ति का चित्र उनके सामने रख दिया। “देख लो, ये महानदेव हैं, विश्वगुरु संप्रदाय के फाउंडर।”
“यह कौन सा संप्रदाय है?” उन्होंने पूछा, “क्या यह सनातन धर्म से अलग है, और यह कब स्थापित हुआ?”
“अरे यार, डोंट डिस्टर्ब, यू आर आस्किंग अ टू कैंप्लिकेटेड क्वेश्चन एंड किलिंग टू मच टाइम, एवरीबॉडी नोज हिम, गो देअर, हैव ए प्रिंटाऊट आफ हिज बायो डाटा फ्राम इंटेरनेट”, और तब उसने पार्क के दूसरी ओर बने इंटरनेट कैफे की ओर इशारा करते हुए भेज दिया। कॉन्वेंट में पढ़ रहे बच्चे की बातों का पूरा आशय तो नारद मुनि नहीं समझ पाए पर वह इतना अवश्य समझ गए कि वहां जाकर उस स्थान से महानदेव का बायोडाटा लेना है।
नारद मुनि की एक समस्या हल हो गई थी कि कम से कम इस व्यक्ति का नाम तो उन्हें पता चल ही गया था। बस बायोडाटा मिल जाय तो काम बने। इंटरनेट कैफे से जैसे तैसे उन्होंने बायोडाटा और अन्य जानकारी निकली और कैलाश पर्वत की ओर उड़ पड़े। उनका उद्देश्य पूरा हो गया था। त्रिदेव वहां उनका इंतजार कर ही रहे थे। उन्होंने वह बायोडाटा त्रिदेव के समक्ष रख दिया जो कुछ इस प्रकार था:
नाम: महानदेव
परिचय: विश्वगुरु संप्रदाय के संस्थापक
समय: अमृतकाल
प्रभाव क्षेत्र: रंगद्वीप
प्रकार: आभासी माध्यमों के प्रचंड देवता
संप्रदाय का स्थापना वर्ष: विक्रम संवत दो हजार इकहत्तर
प्रमुख अस्त्र शस्त्र: फेसबुक, यूट्यूब, ई डी, सी बी आई, एक्स एवं पेगासस
पहनावा: डिजाइनर कुर्ते एवं सूट, विशेष अवसर पर पगड़ी
दाढ़ी: मुगल शासकों से प्रभावित
कार्य: अन्य राजाओं को अपदस्थ करना
असर: सर्वव्यापी, भक्तों की संख्या ब्रह्मा विष्णु महेश के अनुयायियों के कई गुना ज्यादा
वैवाहिक स्थिति: विवाहित, किंतु पत्नी या अन्य महिलाओं को कोई महत्व न देना
स्वभाव: हर प्रश्न पर मौन धारण करना
उद्देश्य: रंगद्वीप में लोकतंत्र हटाकर विश्वगुरु संप्रदाय के एकछत्र राज्य की स्थापना
फेसबुक फ्रेंड: ट्रंप, पुतिन एवं जार्जियो मेलोनी
स्टार प्रचारक: ड्रैगनमुख
इस प्रोफाइल को देखते ही त्रिदेव चौंक पड़े। कलियुग में स्वयं ही कोई मानव अपने को अवतार घोषित करने लगा है, इसकी भनक उन्हें जरा भी नहीं थी। भगवान विष्णु के कल्कि अवतार तो अभी अपने समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। सोशल मीडिया शब्द भी त्रिदेव के लिए एक पूर्णतया नया शब्द था जिससे वे परिचित नहीं थे। जब भगवान विष्णु की नजर महानदेव की प्रोफाइल में वर्णित अस्त्रों पर पड़ी तो वह आश्चर्यचकित हो गए क्योंकि उनके पास इस तरह के कोई अस्त्र नहीं थे और न वह उनसे परिचित ही थे। प्रोपेगेंडा, फेसबुक, एक्स और पेगासस का नाम भी उन्होंने नहीं सुना था। आई टी सेल तो छोड़िए, उनका तो कोई सोशल मीडिया अकाउंट भी नहीं था जिसपर वह भक्तों से मन की बात कर सकते और महादेव ने तो इधर कई वर्षों में रंगद्वीप से लगभग अपना संबंध ही तोड़ लिया था।
तीनों देवताओं के माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट देखी जा सकती थीं। वह सोचने लगे कि जो दिव्य अस्त्र रंगद्वीप के उदयीमान देवता महानदेव के पास हैं उनका जवाब वह कैसे दे पाएंगे। प्रोपेगेंडा नामक ब्रह्मास्त्र का प्रयोग तो त्रिदेव भी नहीं जानते थे और भगवान विष्णु ने तो इधर अपनी वर्जिश भी छोड़ दी थी। महानदेव द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां तो रंगद्वीप से अर्जित शक्तियां थीं जिनका कोई जवाब न तो बैकुंठ में था, न कैलाश पर और न ब्रह्मलोक में। अतः अपडेटेड न रहने का पश्चाताप उन्हें साल रहा था।
धर्म का प्रयोग अपनी सत्ता को स्थापित करने के लिए इस तरह किया जाएगा यह तो गीता में भी अर्जुन को कृष्ण ने नहीं बताया था। सृष्टि के कल्याण में संलग्न त्रिदेव के धार्मिक विश्वास पर भी अब प्रश्न उठने शुरू हो गए थे क्योंकि अब विश्वगुरु संप्रदाय में केवल महानदेव ही सबके रचयिता थे, पालनहार और विनाशक भी। वही मुहूर्त भी थे। उनके शासन में सत्ता या धर्म के कई सत्ता केंद्र हो ही नहीं सकते थे और न ही लोगों को इसकी अनुमति ही थी। जो भी महानदेव के विरोध में कुछ बोलता उनके अनुयाई उसका मर्दन करने पंहुंच जाते और उसका ताड़न कर आते क्योंकि स्वयं महानदेव के अमात्य मुद्राराक्षस उनके संरक्षक थे। जिन शंकराचार्यों ने इस मंदिर के अधूरे होने का प्रश्न उठाया था वह साइडलाइंड कर दिए गए थे। रंगद्वीप में उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। इन शंकराचार्यों के अलावा कहीं दो चार अन्य लोगों को अगर अपने पुरातन धर्म की मान्यताओं की स्मृति भी थी तो वह भी धीरे धीरे महानदेव के अमात्य छद्म मालवीय द्वारा प्रचारित सूचनाओं के कारण स्मृतिलोप का शिकार होने लगे थे।
महानदेव के बड़े बड़े चित्र रंगद्वीप के नए राम मंदिर के आसपास मंदिर से भी बड़े आकार में लग गए थे और उनपर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था “जो राम को लाए हैं, वह हमको भायेंगे” और लाउड स्पीकरों से इसका बारंबार उदघोष भी हो रहा था। एक नया नारा ‘विधान ही व्यवधान है’ भी सुर्खियों में आना शुरू हो गया था। रंगद्वीप के निवासियों को यकीन हो चला था कि श्री राम से ज्यादा प्रतापी अपने महानदेव ही हैं इसलिए वह अपने वार्तालाप एवं राजनीतिक चर्चा में भगवान राम की कृपा से मंदिर बनाने के जिक्र के बदले महानदेव की माया और कृपा का बखान करना शुरू कर चुके थे। ‘जय श्री राम” के नारे में सिया तो पहले ही निकाल दी गईं थीं, पर विश्वगुरु संप्रदाय के अनुयायी प्रसन्न थे क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज स्थापित करने का उनका पुराना स्वप्न बस पूरा होने ही वाला था। इस संप्रदाय के प्रतीक पुरुष महानदेव विवाहित तो थे पर कभी किसी ने उनके मुखारबिंद से उनकी पत्नी का नाम नहीं सुना था। उनके जीवन में पत्नी के प्रति पति के कर्तव्य का कहीं कोई जिक्र न होना आखिर पितृसत्ता की ही तो विजय थी। श्रीमद्भागवदगीता में भगवान कृष्ण के बताए हुए अन्य मार्गों जैसे कर्मयोग और ज्ञानयोग को लगभग प्रतिबंधित कर दिया गया था और सिर्फ भक्तियोग का ही प्रचलन बढ़ गया था। विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा भक्तियोग को महानदेव के सानिध्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन बताते हुए प्रचार प्रसार करने हेतु शिविर लगाए जा रहे थे। तर्क की महत्ता पूरी तरह समाप्त हो गई थी। त्रिदेव के विभिन्न अवतारों के बीच झगड़ा भी बढ़ाया जा रहा था और इस कारण ज्यादातर लोग अन्य देवताओं की पूजा के बदले ‘एक सधे तो सब सधे’ सिद्धांत का पालन करते हुए केवल महानदेव को ही भजने में लगे थे। अब अपना मंदिर स्थापित करना ही उनका अगला लक्ष्य था। इसी तरह धीरे धीरे रंगद्वीप में अमृतकाल स्थापित होना लगभग शुरू हो गया था जिसकी पूर्ण स्थापना हो जाने पर त्रिदेव को धरती पर मनुष्यों में बीच अपनी स्मृति के लोप होने का भय स्पष्ट रूप से नजर आ रहा था।