कभी तो जिंदगी में पीछे मुड़कर देखना होगा
कभी ये सोचना होगा कि कहां से चलके आए थे?
वे राहें कौन सी थीं जो हमारे घर को जाती थी
वे बातें कौन सी हैं जो अभी तक याद आतीं हैं।
वो कैसे लोग थे जिसने हमें चलना सिखाया था
वो कैसी माएं थीं जिनने हमें लोरी सुनाई थी।
उन हल्की थपकियां ने कैसे चुपके नींद दे डाली
कि कैसे आंचलों में यूं लगा संसार सारा है?
कमी तो थी वहां पर साथ रिश्तों की अमीरी थी
महज दो पुपलियो में ग़ज़ब की ताकत हठीली थी।
तन पर कपड़े कम थे पर वहां जाड़ा नहीं था
कर्मरत हाथ थे बस पास, कोई रखवाला नहीं था।
कभी जब यूं अकेले में मेरा घर याद आता है
मैं खुद से पूछता हूं क्यों यहां वैसा नहीं लगता?
अब घर गिर गए हैं, लोग भी जाते रहे तजकर
शहर में पास सब कुछ है, मगर वैसा नहीं लगता।
उजड़ते आंगनों में बैठ कर यह बात जानी है
शहर में घर तो हैं फिर भी यहां वैसा नहीं लगता?
कभी तो जिंदगी में पीछे मुड़के देखना होगा…