क्या खूब झगड़ा आजकल सजदाघरों का है
मैं जब भी सिर झुकाता हूं ये अंतर भूल जाता हूं।
मुझे मस्जिद कलीसे भी किसी मंदिर से लगते हैं
मैं उनको देखकर खुद अपना मज़हब भूल जाता हूं?
है मालिक कौन दुनिया का भला मैं पूछता क्यों हूं?
कि यह भी उसकी मर्जी है मैं अक्सर भूल जाता हूं।
खड़ा मैं जब भी होता हूं किसी सच के शिवाले में
लगे किस रंग के झंडे मै अक्सर भूल जाता हूं।
सियासत जो भी कहती हो, हूं मैं भी आदमी आखिर
हिदायत कैदगाहों की मैं अक्सर भूल जाता हूं।
क्या सजदा ही नहीं होता जहां मंदिर नहीं होते
खुदा भी घर में रहता है मैं अक्सर भूल जाता हूं।
सोच का दायरा सिकुड़ा तो जिएंगे कैसे आखिर लोग?
मैं किताबों में लिखी हिदायत भूल जाता हूं।
कागज़ी पैरहन का हर नशा ईतना गुमानी है
ये बातें नज़्म में कहना मैं अक्सर भूल जाता हूं।