मैं तुम्हे पुष्प बुलाऊं, तुम कहो भ्रमर मुझको
ये वही बात पुरानी, इसमें कुछ नया क्या है?
तुम बनो सागर मेरे, मैं नदी बहती बेकल
ये वही बात पुरानी, इसमे कुछ नया क्या है?
समय की लहर में यूं बह गए मानक अपने
फूल पर धूल जमी है, नदी रेत से पट चुकी कब की।
सागर को इंतजार है लंबा…नदी से मिलने का!
कवि गरीब सा उपमान खोजता फिरता।
कोयल की कूक कहां, मैना की डाल खाली है
महुए की महक कहां, न सरसों की चूनर धानी।
वे कहते हैं, कवि जी, तुम भी पिज़्ज़ा हट जाओ
बरगरे-शाम पर दो-चार पंक्तियां कर लो।
अब लिखो ‘सॉस बन कर मैं ब्रेड से लिपट जाऊं’
या ‘रिंग टोन बन कर मैं बजता रहूं बारंबार ।
नया जमाना है, सब कुछ नया है इसमें
दिल में पासवर्ड भी है, वायरस भी नया है इसमें।
रहना जरा बच बच के, ओ प्यारे से पाठक मेरे
आज मायूस हैं, कल नई रेख रच देंगे।