अग्निपथ पर अटल रह हुंकार कर
जो भी आए सामने स्वीकार कर
कोई आग्रह या किसी याचना क्या
महाभारत सज गया है युद्ध कर।
बहुत तुमने संस्कृति का भान रखा
बहुत तुमने बंधुता का मान रखा
दूत भेजा शांति का प्रस्ताव रखा
शत्रु पर अब अस्त्र का संधान कर।
शिविर में विश्राम अब तू त्याग दे
वीर है तू युद्ध पर अब ध्यान दे
छोड़ कर निज हानि की चिंता सदा
लक्ष्य को अब ध्यान में अपने लगा।
भूल जा संग्राम के परिणाम को
याद तू अपने कुल के मान को
परिजनों की मोह माया त्याग कर
महाभारत सज गया है युद्ध कर।
मानता कुछ वीरगति को प्राप्त होंगे
दुश्मनों के तुझपर भी आघात होंगे
ये तो निश्चित है विजय की प्राप्ति होगी
कृष्ण जब रथ पर तुम्हारे साथ होंगे।
भूल जा तू अब शिखंडी कौन है
वह कौन जो संकट से डरकर मौन है
समर में ही अब मिलेंगे तय हुआ
दुष्टता के व्यूह से कब भय हुआ?
युद्ध ही है शांति का आलंब अब
कर यती तू हवन का प्रारंभ अब
सखा का आदेश अब स्वीकार कर
महाभारत सज गया है युद्ध कर।
कुचल दे इन कौरवों के दंभ को
तोड़ दे छल कपट के अनुबंध को
भूल जा उनसे तू निज संबंध को
महाभारत सज गया है युद्ध कर।
रुधिर जब मिलकर बहेगा स्वेद से
कौरवों का अंत होगा भेद से
रक्त रंजित हो के रोएगी धरा
संधान जब शर का करेगा वेग से।
युद्ध का अब नाद गुंजित हो रहा
शोणित पिपासु काल बैठा देखता
धरा को तू पापियों से मुक्त कर
आ गया है समय अब तू युद्ध कर।
अग्निपथ पर अटल रह हुंकार कर
जो भी आए सामने स्वीकार कर
कोई आग्रह या किसी से याचना क्या
महाभारत सज गया है युद्ध कर।