उठो भूमि पर पड़े पथिक तुम
आगे बढ़ने के मतवाले
बस कदमों के थक जाने से
राही नहीं रुका करते हैं।
चलो क्षितिज की और चलें
आंधी का रुख मोड़ चलें
तूफानों के आ जाने पर
लक्ष्य नहीं बदला करते हैं।
बस साधन है थकन तुम्हारी
दृष्टि साध्य पर तानो फिर से
मन से हारे नहीं अगर हो
कौन तुम्हे हारा कहते हैं?
जीवनलीला यह क्षणभंगुर
दो पल का ही मेला सारा
कुछ फूलों के मुरझाने पर
उपवन कहां कभी रोते हैं?
भले बिजलियां टूट पड़ें
घिर आएं घनघोर घटाएं
भले प्रलय ही हो जाए
योद्धा कहां डरा करते हैं?
तमस जीत न सका कभी
एक जरा सी मद्धिम लौ से
जरा सूर्य ओझल होने पर
जुगनू कहां बुझा करते हैं?
उठो भूमि पर पड़े पथिक तुम
आगे बढ़ने के मतवाले
बस कदमों के थक जाने से
राही नहीं रुका करते हैं।