सब चले गए
जितने थे…
नेह के, स्पर्श के
ताप के, संघर्ष के
प्रतिबिंब चले गए।
वो छोटा सा घरौंदा
क्षिति पर
मिट्टी का चूल्हा
कुछ सोंधा सोंधा सा
खदर कर बह गया जो
बारिश के थपेडों में कभी का।
वो मां की हथेली और आंचल
जो हमे था सिक्त करता
वो दादी, खुद कहानी बन गईं
लोरी सुना कर
पोते के सिर पर फिर रहे वो हाथ
बाबा के, कुछ खुरदरे से
उंगलियां जो सिंक गईं होरहा लगाते
बाप के कंधे, कराते जो सवारी
पीढियों का एक होना परस्पर
जूझना, सहना सिखाना।
वो सीधे और साधे
बोली में कड़क पर गुड़ से मीठे
मिट्टी की महक में रच-बसे से
सब चले गए।
खो गई
हर गांव की उम्मीद
शहर की भीड़ मैं
बस रह गए हम
तुम, कमरा और कमरे।