बड़े अधिकारियों के कष्ट कई तरह के होते हैं, कभी दस्तखत में ताकत होने की असहजता उन्हें चैन से सोने नहीं देती तो कभी दस्तखत की ताकत खो जाने का भय उन्हें सालता रहता है । यह दोनों अवस्थाएं बड़ी ही कष्टदायी हैं और इस कारण उनके स्वभाव में एक अलग सी बेचैनी नजर आना स्वाभाविक है। इसलिए बड़े अधिकारियों के साथ कुछ छोटी-मोटी घटनाएं हो जाया करती हैं।
साहब एक बड़े संस्थान में अधिकारी थे। आप उन्हें श्रीमान दस्तखत भी कह सकते हैं क्योंकि उन्हें अपनी दस्तखत का बड़ा गुमान था। इस कारण उनका पूरा व्यक्तित्व ही उनकी दस्तखत के इर्द-गिर्द सिमट गया था। आजकल उनका कार्यालय खाली खाली रहता क्योंकि गर्मी की छुट्टियां चल रही थी इसलिए बारह बजे बजे तक भी कोई छात्र-छात्रा या कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज उनके हस्ताक्षर के लिए उनके समक्ष नहीं आया था। संस्थान के सभी शिक्षक अपनी छुट्टियों का आनंद लेने अपने परिवार के साथ थे, कोई शिमला में था तो कोई ऊटी की सदाबहार वादियों में। फेसबुक पर लगातार आती उनकी तस्वीरें श्रीमान दस्तखत को बड़ा ही कष्ट देती पर वे कर ही क्या कर सकते थे। उन्हें बड़ी बोरियत होती जब आसपास कोई मजमा नहीं होता और उन्हें अकेले ही अपने दफ्तर में बैठना पड़ता। बातचीत करने के लिए कुछ अनुचर और इक्के दुक्के लिपिक ही होते। श्रीमान दस्तखत उनसे क्या बात करते? हां, अगर भूले भटके कोई शिक्षक मिल जाता तो वह अवश्य ही उसे बैठा कर किसी गूढ़ विषय पर चर्चा कर लेते पर प्रांगण में इस बार कोई शिक्षक था ही नहीं। यह उनके कष्ट का एक बहुत बड़ा कारण था।
खाली बैठकर वह कभी-कभी अपने कक्ष में लगी पूर्ववर्ती संस्था प्रमुखों की तस्वीरों को निहारते और कभी महात्मा गांधी और अंबेडकर को जिनकी तस्वीरें उनके ठीक पीछे लगी थीं। उनके पूर्ववर्ती संस्था प्रमुखों के गुणों की चर्चा भी उन्होंने सुन रखी थी। उन सभी के आचरण में छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के प्रति उनकी सहृदयता उन्हें बड़ी बेकार चीज लगती क्योंकि वह अपनी धाक और ठसक में विश्वास रखते थे। अतः जैसे ही कोई कागज उनके सामने दस्तखत के लिए प्रस्तुत होता उनकी भाव भंगिमा कठोर हो जाती और उंगलियां थम जाती। वह थोड़ी देर उस छात्र-छात्रा के सामने अपनी रिवाल्विंग चेयर पर इठलाते, उसे अपने महत्व के बारे में बताते और तब जाकर या तो दस्तखत करते या इनकार करते। कभी-कभी तो किसी शिक्षक द्वारा कोई आवेदन प्रस्तुत करने के साथ ही अपने को फोन पर बिजी कर लेते और आधे आधे घंटे तक इधर-उधर की बात किया करते ताकि उस शिक्षक को उनकी महानता का आभास हो जाए। कभी तो फोन उठाते ही नहीं भले ही कोई भी आवश्यक कार्य हो। कुल मिलाकर ऐसी ही दिनचर्या रहती। इस कारण उन्हें न गांधी अच्छे लगते और न अंबेडकर क्योंकि उनके अनुसार इन दोनों ने ही अहिंसा और कायदे कानून की बातें बता कर भारत को पूरी तरह चौपट कर दिया था।
अपनी ट्रेनिंग के दौरान उन्हें यह एहसास हुआ कि उनका दस्तखत बहुत महत्वपूर्ण है और यह हर जगह नहीं किया जा सकता, बड़ी आसानी से तो कतई नहीं। इसलिए वह किसी भी पत्रावली पर दस्तखत करने से साफ मना कर देते भले ही वह कोई रूटीन कार्य ही हो, और अगर कहीं भावावेश में कोई दस्तखत हो जाती तो वे पश्चाताप से भर जाते और सपनों में जाकर उस दस्तखत को बार बार काटते रहते। कई बार तो अपनी उंगलियों को पीछे मोड़कर सजा देते कि उन्हें यह सनद रहे कि भावावेश में कदापि नहीं बहना है। इस कारण वे पूरे दिन तनाव में रहते। छुट्टियों में उन्हें हाजरी काटने को भी नहीं मिलता, किसी पत्र या आवेदन पर दस्तखत करना तो दूर की बात है। श्रीमान दस्तखत के लिए यह समय बड़ा असहज करने वाला था। वह अपनी व्यथा शिक्षकों से कैसे कहें? किसी हितैषी के समझाने पर भी श्रीमान दस्तखत कभी अंतर्मन में अपनी प्रवृति पर चिंतन नही करते क्योंकि बार बार उनकी ट्रेनिंग आड़े आ जाती जो उन्हें रोक देती और वे फिर सब कुछ भूल कर अपनी मूंछों पर ताव देते और मन ही मन कहते, “कागज़ लाओ, तब बताता हूं”, अतः स्थिति के परिवर्तन की कोई आशा नहीं थी। उन्होंने अपने दफ्तर के पीछे के कमरे में अपने अभ्यास हेतु जगह भी बना रखी थी ताकि प्रैक्टिस बनी रहे।
अंततः छुट्टियां बीत गई और संस्थान खुल गये। उनके कार्यालय में फिर से पुरानी रौनक लौट आई थी और इस बात की उन्हें बड़ी प्रसन्नता थी। दफ्तर गुलजार हो चुका था। तभी एक दिन अचानक वरिष्ठ शिक्षक मकरंद मिश्र अपनी कोई पत्रावली लेकर प्रस्तुत हुए। मकरंद मिश्र कुछ दिनों में रिटायर होने वाले थे। दिक्कत यह थी कि मकरंद मिश्र कभी कभार अपनी कविताओं और वक्तव्यों में उनकी आलोचना भी कर डालते। इस कारण वह उनसे काफी नाराज चल रहे थे और पत्रावली के सामने आते ही उन्होंने मकरंद मिश्र को सबक सिखाने का निर्णय कर लिया था।
पत्रावली सामने देख वह अभी अपनी रिवाल्विंग चेयर पर इठला ही रहे थे कि यह क्या, उनकी उंगलियों ने तपाक से मकरंद मिश्र की पत्रावली पर दस्तखत कर दिया। ऐसा त्वरित रिस्पॉन्स देखकर श्रीमान दस्तखत सन्न रह गए, पर दस्तखत तो हो चुकी थी। दस्तखत होते ही मिश्र जी अपनी पत्रावली लेकर फुर्र हो गए। इधर श्रीमान दस्तखत का पारा सातवें आसमान पर था और वह जोर से चिल्लाए, “सस्पेंड, सस्पेंड, सस्पेंड’, और अपने क्रोधातिरेक में उन्होंने लिखित आदेश निकाला और अपनी ही उंगलियों को सस्पेंड कर डाला। उन्हें अन्य कोई उपाय सूझ नहीं रहा था, स्टेनो भी बेचारा क्या करता, बोलने पर उसकी शामत जो आ जाती। अपने आदेश पर हस्ताक्षर कर श्रीमान दस्तखत बहुत प्रसन्न थे क्योंकि उनके हिसाब से यह एक कालजयी आदेश था जो अमृतकाल की नजीर बनकर युगों युगों तक आने वाले अधिकारियों का निर्देशन करने वाला था। वह जानते थे कि अगले दिन समाचार पत्र में बड़ी हेडलाइंस में यह खबर छपेगी “अधिकारी ने की अपनी उंगलियां सस्पेंड” और सभी ओर उनकी जय जयकार होगी। लोग यह कहते नहीं थकेंगे कि अधिकारी तो ऐसा ही होना चाहिए जो किसी नाफरमानी पर अपनी उंगलियों को भी न बक्शे। इसलिए आज उनकी खुशी की कोई सीमा नहीं थी।
घर पहुंचने तक उन्हें बड़े जोरों की भूख लग आई थी। पत्नी ने भोजन ला कर सामने रख दिया। पर जैसे ही उन्होंने निवाला तोड़ना चाहा, यह क्या, उंगलियां तो जैसे हिल ही नहीं थीं। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ, और तभी थोड़ी देर बाद उन्हें याद आया कि उन्होंने स्वयं ही अपनी उंगलियों को सस्पेंड कर दिया है, अब उंगलियां हिलें कैसे? बड़ी विचित्र स्थिति थी। उनकी पत्नी हैरान परेशान सब देख रही थीं पर उन्हें कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। घबराकर उन्होंने पूछा, “क्यों, क्या हुआ, डाक्टर से दिखाएं क्या?” पर श्रीमान दस्तखत मौन थे क्योंकि उन्हें अब वस्तुस्थिति की गंभीरता का एहसास होने लगा था। उन्होंने पत्नी से कहा, “मुझे आज भूख नहीं है, तुम सो जाओ”। उनकी सारी भूख खत्म हो चुकी थी और वह व्यग्र होकर अगले दिन का इंतजार करने लगे थे जब उन्हें मजबूरन खुद अपनी उंगलियों का सस्पेंशन रिवोक करना था।
अगले दिन वह लगभग भागते हुए वह दफ्तर पहुंचे और अपने स्टेनो को सस्पेंशन रिवोक करने का आदेश बनाने को कहा। जब आदेश बनकर उनके सामने आया तब उन्हें एहसास हुआ कि उंगलियां तो सस्पेंड हैं, अब आदेश पर उनका हस्ताक्षर कैसे होगा? उनके माथे पर बल पड़ गए। तभी लेखाकार ने सुझाव दिया कि यह सस्पेंशन आपसे बड़ा अधिकारी ही रिवोक कर सकता है। परेशान होकर उन्होंने अपने बड़े अधिकारियों से संपर्क किया। पूरी बात जान कर अधिकारी भी चौंक गए क्योंकि उन्होंने कभी भी ऐसी परिस्थिति का सामना ही नहीं किया था। उन्होंने कहा, “शासनादेश देखेंगे, तब बताएंगे”। अंततः शासनादेश देखे गए, परिनियमावली खंघाली गई पर उंगलियों का सस्पेंशन रिवोक करने का कोई शासनादेश ही नहीं मिला। इधर समाचार पत्रों से सूचना मिलते ही पूरा शासन तंत्र हिल गया था, नेशनल लेवल के कई न्यूज़ चैनल उनके कार्यालय पंहुंच गए और उनसे बाइट लेने लगे। आसपास खड़े लोग ऐसे सस्पेंशन पर तरह तरह के कमेंट कर रहे थे। कुछ मीम भी फेसबुक और यूट्यूब पर अपलोड हो चुकी थीं और उनकी व्यूज भी लगातार बढ़तीं जा रहीं थीं। श्रीमान दस्तखत न्यूज में हर जगह थे पर उनके पेट में अन्न का एक दाना नहीं गया था, यह अलग बात थी। उनसे बड़े अधिकारी उन्हें लगातार डांटे जा रहे थे और वह जवाब देते देते पस्त हो चुके थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री तक यह बात पहुंच चुकी थी। ऊपरी दबाब से उनका सिर फटा जा रहा था। उन्हें लग रहा था की कहीं वे खुद सस्पेंड न हो जाएं।
तभी वहां बैठे एक वरिष्ठ शिक्षक ने उनके कान में कहा, “शायद जो इस समस्या का प्रस्थान बिंदु है वहीं पर इस परिस्थिति का निवारण भी हो?”। यह सुनकर श्रीमान दस्तखत कुछ सोचने लगे। बोले, “आप उन्हें बुला लाएं और इस समस्या का निदान कराएं, मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करता हूं”। थोड़ी देर बाद मकरंद मिश्र वहां सम्मान सहित बुलाए गए। सारी परिस्थिति भांप कर उन्होंने एक और लंबित पत्रावली वहां मंगाई और मेज पर रख दीं। तब शायर अहमद फ़राज़ की एक ग़ज़ल अपनी स्टाइल में गानी प्रारंभ की:
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ…
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ…
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो…
ये आख़िरी फाइल भी निपटाने के लिए आ…
ग़ज़ल के एक दो अंतरे के बाद श्रीमान दस्तखत की उंगलियां अपने सस्पेंशन को लगभग भूल सी गईं और उसी भुलावे में उन्होंने मकरंद मिश्र की उस आखिरी लंबित फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए और उसी के साथ उनके बीच बड़ी चालाकी से रक्खे गए अपने सस्पेंशन रिवोक करने के आदेश पर भी। श्रीमान दस्तखत प्रो मकरंद मिश्र की सहायता से उस असहज परिस्थिति से मुक्त हो चुके थे। वह हाथ जोड़ कर ईश्वर का बारंबार धन्यवाद कर रहे थे कि उनके आसपास ऐसे लोग मौजूद हैं जिनके पास सभी विपरित परिस्थितियों के भी इलाज हैं क्योंकि ऐसा अनोखा इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। अब उन्हें रिटायर होने वाले शिक्षक का कष्ट भली भांति समझ में आ चुका था और साथ ही दस्तखत की ताकत खो जाने का कष्ट भी। उन्होंने त्वरित गति से अधिकारियों को संदेश भेजा कि यहां अब कोई समस्या नहीं है और सब कुछ अच्छा चल रहा है।