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डांस पे चांस

एक फिल्मी गाना कुछ वर्षों पहले आया था जिसका मुखड़ा कुछ “डांस पे चांस मार ले” से शुरू होता है। उस समय तो इसका मतलब मुझे समझ नहीं आया कि गायक कहना क्या चाहता है पर इसका अर्थ मुझे अब समझ में आया है।’डांस पे चांस मार ले’ गाना तो उनके लिए था जिन्हें डांस आता हो पर जिन्हें डांस का कुछ भी नहीं आता वे क्या करेंगे, गाना लिखने वाले को ये अवश्य सोचना चाहिए था। वैसे आजकल शादियों का...

पुतलियों के प्रश्न

राजा विक्रमादित्य के देहावसान के बाद सदियां बीत चुकी थीं पर भारत में उनके द्वारा स्थापित की गई राज्य व्यवस्था अभी भी वैसे ही चल रही थी । उनके सिंहासन की बत्तीस पुतलियां अभी भी सिंहासन में जड़ी हुई थीं और उनके लिए राजा की परीक्षा लेना रूटीन कार्य हो चुका था। राजा आते, जाते, फिर नए आते, सदियों से यही चल रहा था। उनके मन मस्तिष्क में धीरे धीरे एक उदासी ने घर बना लिया था। हां, नए राजा के आने के पश्चात...

मंडूक स्तवन

कल स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष के छात्र सागर पांडेय के एक प्रश्न ने मुझे चौंका दिया। उसने पूछा, “सर, लॉर्ड मैकाले की मिनट तो अठारह सौ पैंतीस की है, फिर आज भी लोग उस को बुरा भला क्यों कहते हैं, क्या वह अभी भी कोई भूमिका निभा कर रहा है अपनी शिक्षा नीति में?” अचानक पूछे गए प्रश्न से मैं थोड़ा चिंतित तो हुआ लेकिन मुझे उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए कुछ तो कहना था। अतः मैंने उससे कहा, “अब यह सवाल...

पहला विश्वगुरु

अभी-अभी स्नातकोत्तर अंग्रेजी की कक्षा से ग्रीक दार्शनिक एवं आलोचक लोंजाइनस की सब्लाइम थ्योरी पढ़ा कर लौटा था। सब्लिमिटी की व्याख्या करते समय मैंने उनसे कुछ शब्दजालों की बात की जो अक्सर आलोचक दे दिया करते हैं और फिर उस पर लंबी लंबी बहस और चर्चाएं शुरू हो जाती है। लोंजाइनस अलंकार शास्त्र में सब्लाइम के द्वारा एक ऐसी स्थिति को परिभाषित कर रहा था जब भाषा एक ऐसे स्तर पर पहुंच जाए जहां पर उसकी...

अपना अपना मोक्ष

प्रोफेसर शिवकुमार अपने विभाग में अपने अगले व्याख्यान की तैयारी कर रहे थे। कुछ परेशान भी लग रहे थे तभी विभागाध्यक्ष ने कक्ष में प्रवेश किया। “नमस्कार बंधु, कैसे हैं? सब कुशल तो है न? उन्होंने पूछा।न जाने कैसे उन्होंने प्रोफेसर शिवकुमार के चेहरे पर अंकित परेशानी की रेखाएं पढ़ ली थीं। “नमस्कार, सब ठीक है सर, आप कैसे हैं?” प्रोफेसर शिवकुमार ने पूछा। “मैं भी ठीक हूं, क्लास कब है?” “बस, इसके बाद।” “अरे...

चरैवेति चरैवेति

जिंदगी के इतने वसंत देखने के बाद यह सूक्ति अच्छे से समझ में आई! इसके पूर्व में तो न समय था न विवेक! हमारा अनुभव ही तो आदमी बनाता है, और जब यह बात समझ में आती है तो लगता है कि बहुत कुछ हमारे हाथ से निकल गया जो फिर वापस नहीं आ सकता! जीवन के रास्ते पर हम सभी इतने आगे निकल चुके होते हैं कि अब जो निकल चुका उसे आप फिर जी नहीं सकते, हां आगे का प्रारब्ध अवश्य सुधार सकते हैं जो इस सूक्ति का मंतव्य है! अब...

बरगद से बोनसाई

सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजरते हुए हम सब कहां से कहां आ चुके हैं। प्रगतिशील लोग खुश हैं क्योंकि उन्होंने गांव जैसी इकाई के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं और उनकी विजय पताका जगह-जगह चौक चौराहों पर बड़े-बड़े लैंप पोस्ट, फव्वारे एवं गगनचुंबी इमारतों के रूप में फहरा आ रही है। अब शहर ही आदमी का सबसे बड़ा ठिकाना है, हर आदमी गांव से शहर की ओर भाग रहा है, कभी ना पूरे हो सकने वाले सपनों की तलाश...

दस्तखत

बड़े अधिकारियों के कष्ट कई तरह के होते हैं, कभी दस्तखत में ताकत होने की असहजता उन्हें चैन से सोने नहीं देती तो कभी दस्तखत की ताकत खो जाने का भय उन्हें सालता रहता है । यह दोनों अवस्थाएं बड़ी ही कष्टदायी हैं और इस कारण उनके स्वभाव में एक अलग सी बेचैनी नजर आना स्वाभाविक है। इसलिए बड़े अधिकारियों के साथ कुछ छोटी-मोटी घटनाएं हो जाया करती हैं। साहब एक बड़े संस्थान में अधिकारी थे। आप उन्हें श्रीमान...

पुनर्मूषको भव

महर्षि याज्ञवल्क्य के वंश में आज पहली बार एक पुत्री ने जन्म लिया था। सभी ओर प्रसन्नता थी और महर्षि याज्ञवल्क्य के प्रपौत्र अपनी पुत्री को अपनी गोद में लेकर दुलार रहे थे। उनकी पत्नी सुमेधा भी बहुत प्रसन्न थी क्योंकि महर्षि याज्ञवल्क्य के वैकुंठ जाने के बाद अब जाकर तीसरी पीढ़ी में किसी पुत्री ने जन्म लिया था। महर्षि याज्ञवल्क्य ने तो एक चुहिया को ही अपनी पुत्री बनाकर उसका विवाह किया था, आपको याद ही...

वेलकम टू पाटलिपुत्र

चलिए आज आपको कुछ पुराने दिनों से परिचित कराता हूं। पाटलिपुत्र से तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं अपने प्रिय राज्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यह नाम वहीं से संबंधित है, हां विरोधी पार्टी वाले कभी-कभी इसका नाम जंगलराज से जोड़ देते हैं, यह और बात है। जंगल में मंगल करना कोई हमसे सीखे, और इसके कुछ उदाहरण भी मैं आपको देता हूं। उस दिन मैं अपने गांव से बनारस जाने के लिए निकला था। गांव से थोड़ी दूर एक अन्य...

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.