इन ऊंचे नीचे रास्तों में
मंजिलों के वास्तों में
कोई प्रियतम आन मिलता
कोई प्रिय सहसा बिछड़ता।
कभी उत्थान का आनंद है
कभी गर्दिशों की शाम है
चलते ही जाना जिंदगी है
पल भर नहीं विश्राम है?
मार्ग का आकर्ष सबको
और आगे खींचता है
क्षितिज का हर बिंब नूतन
कदमों को मेरे तौलता है।
हर नदी श्वेतांबरा सी
अपनी गति से दर्श देती
एक ताजगी सी जागती है
जब भी कोई पवन चलती।
कंटको का क्या भरोसा
कब पगों को बेध देंगे
खाईयों का क्या ठिकाना
कब हृदय झकझोर देंगी।
रास्ते का एक पत्थर
सहसा ही रुख मोड़ देता
राह पर चलता बटोही
फिर नया संकल्प लेता।
शिखर की उत्तुंगता को
मुझे चढ़कर देखना है
क्षितिज के उस पार जाकर
अपनी आंखों निरखना है।
पलों की हर अंतरा का
हरेक अनुभव नया सा है
वादियां हो या मरु हो
एक दृश्य सबके सामने है।
आजमाना है जिसे भी
निर्भीक हो चलता रहेगा
समय के खाली पटल पर
नाम अंकित कर सकेगा।
कादंबरी के मंच पर
जाने कितने अंक आते
कुछ ही तो उनमें दृश्य होते
याद रह जाते सभी को
याद रह जाते सभी को।