शक-ओ-शुबहा पनप रहे हो जहां
वहां जाने का दिल नहीं करता
होश की मिल्कियत को अब
दिल लगाने का जी नहीं करता।
कोई भी बच नहीं सकता
इस माहौल की मक्कारी से
जहां पर सच के दावेदारों में
तरफदारी हद से ज्यादा है।
अब चेहरे साफ नहीं दिखते
जो कभी आईने से लगते थे
आज हक के तलबगारो में
नाउम्मीदी हद से ज्यादा है।
साहिबे-दरबार अब हम पर
कुछ मेहरबान हद से ज्यादा है
मेरा कलाम मुझसे कहता है
यहां अंधेरा हद से ज्यादा है।
जो भी हो अंजाम देखा जाएगा
चुप रहकर कोई नहीं जी पाएगा
चला है दौर सिरफिरी का अब
मुखबिरी भी हद से ज्यादा है।
कलम की नोक से हटाऊं
फहम के जाले कितने?
ज़बाँ की धार कुंद करने को
अब इंतजाम हद से ज्यादा है।