नया सा पुष्प किसी भी डाल पर
नया पल्लव किसी भी टहन पर
हरी सी दूब मृदा की छाल पर
उगेगी क्या रेत के शहर में?
प्रेम की किरण मन के क्षितिज पर
नई मुस्कान किसी के अधर पर
नया संगीत किसी भी ताल पर
सजेगा क्या रेत के शहर में?
मैं खुद सृष्टा हूं ऐसे तंत्र का
मैं खुद दोषी हूं भूले मंत्र का
मनुज से मनुज बिल्कुल विलग सा है
फलेगा क्या रेत के शहर में?
कैसे परिजन, क्या कुटुंब की कल्पना
बड़ों का संग, धर्म की अल्पना
सभी भूले झूठी प्रगति के छद्म में
मैं क्यों आया रेत के शहर में?
प्रकृति का संग, जीव संवेदना
सुखद संतुल्य स्वयं के लिए ही
गांव से निकल यंत्र के जाल में
हम भूले सुबह, भूले शाम भी।
अहं ही प्रमुख, यह कैसा जश्न है?
अंतरमुखता स्वयं में ही प्रश्न है
स्वयं पर स्वयं के इस कहर में
मैं क्यों आया रेत के शहर में?
सभी उलझे हैं यंत्र संजाल में
ह्रदय संवाद बिल्कुल छिन्न है
ठगा सा अपने अवयव ढूंढता
जिन्हें लाया मैं रेत के शहर में।
अपनी पहचान खुद ना हो रही
हाथ से डोर कब की जा चुकी
मिला क्या मुझे रेत के शहर में
मैं क्यों आया रेत के शहर में?