जहां तक रौशनी नहीं जाती
वहां भी मेरी गजल जाए
हौसले मेरे कम नहीं होगे
भले ताउम्र यह सफर जाए।
रोज ही एक नए फसाने का
अजीब शौक है तुझको
लिख दूं मैं तुझ पर शेर कोई
तेरा नकाब ही उतर जाए।
चलो कुछ आग छुपी रहने दूं
इश्क भी, रंज भी अपना
कुछ दिनों बाद देखेंगे
कहां क्या-क्या लिखा जाए?
मैं बहुत दूर निकल आया
जैसा उसने मुझसे चाहा था
अब तो पिछला मरहला मुझको
ज़रा ज़रा सा ही बसर आए।
अब कलम है, चंद गजलें हैं
मैं ही उस्ताद हूं, शागिर्द भी मैं हूं
यहीं मरू भी है, चश्मे-शाही भी
चाहे जिस ओर कोई निकल आए।
रातें गुजरी है मेरी तारों में
बहुत गुजरी है पर किताबों में
अपनी नजरों से शहर देखा है
लोग बेज़ार ही नजर आए।
मैं सिरहाने कब से बैठा हूं
लोग सोते हुए नजर आए
उठेंगे जब रौशनी होगी
क्यों न खुद रौशनी बना जाए?