हम मानव संक्रांति काल के
मूल्यों के अवसान काल के
नए पुराने दो पाटों में
सामंजन बैठाया करते
संबंधों की डोर न टूटे
खुद का जी बहलाया करते
हमने है पितरों से सीखा
ऊंचाई पर गर्व न करना
अपनेपन के आलिंगन में
सब को लेकर साथ है चलना।
अर्जन की कमी खलती है
मन में कोई कमी ना आई
अपना खो कर सबको पाया
मन में लेकिन क्लेश ना आया
नैतिकता का मोल बड़ा है
सोच में कोई आंच न आई
आज इस संक्रांति काल में
जीवन मूल्यों का मोल नहीं है।
कोई द्रोण भी आज न दीखे
शिष्यों में अपना हित देखे
कोई शिष्य भी आज न मिलता
अर्जुन सा प्रतिभा प्रमाण हो
कोई शिष्य भी आज न मिलता
जो एकलव्य सा श्रद्धावनत हो
खोजे जरा कर्ण सा दानी
कहीं मिले मुझको दिखलाओ?
हम भूले आदर्श राम को
सब तजकर वल्कल अपनाया
पिता वचन को नम आंखों से
स्वीकारा निस्वार्थ चल पड़े
हमको बुद्ध महावीर भी भूले
जो जन्मे थे राज महल में
जीवन के मूल्यों की खातिर
तजकर सब योगी बन जाए।
मित्रों यह संक्रांति काल है
भले बुरे का भेद न सूझे
जड़ से जुड़ना क्या होता है
नव पल्लव यह कैसे बूझें ?
संस्कृति बिना प्रगति झूठी है
जैसे छलके अधजल गगरी
सब में है यह ह्रास हो रहा
चाहे जड़ हो या चेतन री।
आज हमें यह सिखलाते हैं
जीवन जीने के नए तरीके
मानव होने का मोल ना कोई
धन से सब तोले जाते हैं
तुमने अब तक यह ना समझा
मेरी जड़ में देसी मिट्टी है
लाख तिरस्कृत होने पर भी
मिट्टी अपना स्वाद न खोती
बारिश की बूंदें पड़ने पर
सोंधी सोंधी महक है उड़ती।
नए भुलावे में पढ़कर जो
संस्कृति का अभिमान न खोता
सोना अगर अगर शुद्ध होए तो
स्वाभाविक पहचान न खोता
तुम्हें फले यह तेरा जीवन
हमें हमारे पर चलने दो
माना पंथ कठिन है लेकिन
कदमों को कुंदन करने दो
माना यह संक्रांति काल है
अपनी परख स्वयं करने दो।
अगर रुकेंगे मेरे पग तो
जीवन का अंतिम क्षण होगा
ना कोई भी तृष्णा होगी
ना कोई संताप ह्रदय में
लेश मात्र ना चिंता होगी
स्वर्ग नरक की है बिसात क्या?
मेरा एक पथिक सा जीवन
मुझे नहीं है कुछ ले जाना
मेरा मामूली सा परिचय
स्मृतियां भी होंगी मामूली
तुम्हें समर्पित जो भी मेरा
है ईश्वर साथ तो कौन निहोरा
है वह साथ तो कौन निहोरा?