ये उलझनों के साए जब भी हैं मन पे छाए
हैं मुश्किलें सिखातीं कि कैसे कदम बढ़ाएं?
अंधेरी सी उस डगर पर हो कोई न साथ तेरे
फिर भी है राह मुमकिन जगनुओं ने सिखाए।
डरना नहीं कभी तुम अनजाने रास्तों पर
बस हिम्मतों ने कितने सफर खुशनुमा बनाए।
चलना तो होगा सबको हो वसंत या मरू हो
पर जीतता वही है जो आगे को बढ़ता जाय।
बंजर सी रेत पर मैं ये गज़ल लिख रहा हूं
हंसकर जो मुझसे कहती आ तुझको आजमाएं?
एक शेर मेरा रख लो इस राह पर बटोही
तेरे आंसूओं का कोई यहां पर सिला नहीं है।
ये माना कि पतझड़ों का ये मिजाज़ निर्दयी है
पर इसके बाद ही तो वसंत फिर से आए।
तूफान पहर भर का मेहमान बन के आता
फिर फ़स्ल-ए-गुल की खुश्बू शाखों पे मुस्कुराए।
कागज़ के पैरहन का आखिर है क्या भरोसा
एक बुलबुले के जैसे कब हवा में गुम हो जाए?
एक नाम ही तो बाकी रहता है आखिरी में
वो अमर होके जाता जो कांटों में मुस्कुराए।
ये उलझनों के साए..।