आजकल फेक न्यूज बहुत चर्चा में है। ‘फेक देना’ कुछ दिनों पहले तक क्रिया हुआ करता पर अब ‘फेक’ शब्द का एक विशेषण के रूप में भी प्रयोग होने लगा है। वैसे न्यूज भी पहले न्यूज ही हुआ करती थी। न्यूज पाने के बहुत से साधन हैं जैसे रेडियो, टेलीविजन और गपशप। ये तीनों साधन बहुत पहले से हमारे जीवन में हैं। इनमें रेडियो और गपशप या बतकही सबसे प्राचीन। रेडियो हमारे बचपन का साथी है पर अब वह धीरे धीरे बहुत कम प्रयोग में है हालांकि मेरे छात्र जीवन में समाचार पाने का वह सबसे सटीक और विश्वस्त साधन माना जाता था। बी बी सी लंदन तो मेरी उम्र के लोगों ने सुना ही होगा जिसे सुनना हमारे जमाने के प्रतियोगी छात्र-छात्राओं के लिए बहुत आवश्यक हुआ करता था क्योंकि उसके बिना तो परीक्षा उत्तीर्ण करने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। टेलीविजन के समाचार भी पिछले कुछ बीस साल पहले तक काफी समीक्षात्मक एवं विश्वस्त हुआ करते थे पर अब बहुत से लोगों ने उसे देखना ही बंद कर दिया यह कहकर कि इस पर फेक न्यूज़ आ रही है। फेक न्यूज़ के बारे में सुनकर और समाज में हुए इस परिवर्तन को देखकर मैं सोचने लगा कि इसका बात का विश्लेषण बहुत आवश्यक है कि यह फेक न्यूज़ होती क्या है और इसका मूल हमारे इतिहास के किस काल में है और कुछ लोगों को इससे इतनी विरक्ति क्यों है भला? कहीं पाकिस्तान से तो फेक न्यूज़ नहीं चली आई? बहुत ध्यान देने पर समझ में आया कि बोली गई न्यूज़ और फेंकी गई न्यूज़ में फर्क तो है ही। यह फेक न्यूज बहुत कुछ स्पिन बॉल की तरह होती है जो हमें चकमा दे जाती है पर बैट्समैन अच्छा हो तो फेंकी गई न्यूज़ पर भी चौके छक्के लगा सकते हैं।
एक फेक न्यूज नमक चीज का प्रथम प्रयोग शायद भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर से कराया था जब उन्होंने अश्वत्थामा की मृत्यु के संबंध में “अश्वत्थामा हतो, नरो वा कुंजरो” की गलत बयानी कर गुरु द्रोणाचार्य से अस्त्र शस्त्र रखवा दिया था और तब धृष्टद्युम्न ने अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट ली थी। यहां हमें यह मानना होगा कि फेक न्यूज के इस खेल में भगवान कृष्ण भी भागीदार थे पर तब परिस्थिति भी एकदम अलग थी। वह एक धर्मयुद्ध था इसलिए शायद बिना बहुत हो हल्ला के उन्हें क्षमा भी कर दिया गया। पर यह तो उस समय का अकेला उदाहरण था। अब इसे एक अलग रूप में हर रोज उपयोग किया जाने लगे तब तो निश्चित ही स्थिति अत्यन्त चिंतनीय हो गई है।
बाद के समय में इसका एक अलग रूप भी गांव देहात के लोकाचार में हमें देखने को मिलता है। इस फेक न्यूज देने नामक प्रवृत्ति की आप भोजपुरी के ‘हवा बांधने’ से तुलना कर सकते हैं पर इसे वे ही लोग समझ सकते हों जो गांव गिरांव में रहे या पले बढे हों। ‘हवा बांधने’ का अर्थ माहौल को अपने पक्ष में करने से है। शहर के लोगों के लिए इसे समझना आवश्यक है क्योंकि शहर के लोग हवा बांधने की कला नहीं जानते। मुझे अभी तक याद है कि जब कभी किसी जमीन पर दखल कब्जा करना होता था तो दोनों पक्ष के लोग अपने रिश्तेदारों या परिचितों को इकट्ठा करते, जिस जमीन पर दखल कब्जा करना होता था वह जमीन बीच में रहती, एक पक्ष के लोग एक तरफ थोड़ी दूर पर बैठ जाते और दूसरी तरफ लोग दूसरी तरफ, कुछ लोग मूंज सरकंडों की आड़ में भी बैठते और दूसरे पक्ष के क्रियाकलाप पर नजर बनाए रहते। कुछ बंदूके भी दोनों पक्षों के पास होती। दोनों पक्षों के कुछ सपोर्टर बस हवा बांधने का काम करते। इन लोगों का दोनों तरफ आना-जाना लगा रहता और इस तरह इधर की बात बढ़ा चढ़ा कर उधर और उधर की बात इधर होती रहती। एक बंदूक किसी पक्ष के पास होती तो आठ दस बता दी जाती। लाठियों और लठेतों के बारे में भी बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता। पुलिस इत्यादि कुछ हो जाने पर ही आती। कभी कभी हवाई फायर भी किए जाते जिसे चुगली करने वाले बढ़ा चढ़ा कर बताते। कुछ नामचीन गुंडा टाइप लोगों का भी नाम ले लिया जाता कि वह उस पक्ष के साथ हैं भले ही उनका उस प्रकरण से कोई लेना-देना ना हो। अंततः जो भी हवा बांधने में सफल हो जाता उसका दखल कब्जा उसे जमीन पर हो जाता क्योंकि दूसरे पक्ष से कोई आता ही नहीं। ट्रैक्टर भेज दिए जाते जो जमीन को जोत कर चले आते। यहां यह बात काबिलेगौर है कि दोनों पक्षों के ताकतवर लठैतों से ज्यादा महत्वपूर्ण हवा बांधने में जुटे लोगों का कार्य होता, इसमें कोई संदेह नहीं। यह बात लगभग वैसी ही है जैसे किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र या आदर्शों से अधिक उस दल का आईटी सेल हो चला है क्योंकि उनके पक्ष में माहौल अब वही बना रहा है।
कभी-कभी हवा बांधने का प्रयोग शादी ब्याह कराने में भी होता और वर वधु पक्ष के लोग अपने अपने पक्ष में हवा बंधवाने के चक्कर में बहुत से अनइमप्लॉयड लोगों को चाय पानी पिलाते रहते और इस तरह कभी-कभी उन्हें सफलता भी मिल जाती। हां, यह बात और है कि जब बाद में यह पता चलता कि दूसरे पक्ष के पास बहुत ज्यादा जमीन जायदाद नहीं है तो लोग अपना सिर पीट लेते और उन लोगों को कोसने लगते जिन्होंने उन्हें मूर्ख बना दिया था। इस तरह कितने खोटे सिक्के टाइप वरों की भी शादी हो जाती जिनकी शादी वर्षों से अटकी होती। कभी कभी तो फेक न्यूज का प्रयोग गाय बैल बेचवाने में भी होता। हमारे गांव के स्वर्गीय फतिंगन शुक्ल का बैल बड़ा खतरनाक और गुस्सैल था क्योंकि उसे जब कभी जुताई में लगाया जाता, वह मिनटों में हलवाहे को पटक देता। वह गांव के और कितने ही लोगों को पटक चुका था। फतिंगन शुक्ल तो पटके जाने में रिकॉर्ड बना चुके थे हालांकि पटके जाने के बाद वह अपना गुस्सा बड़े ही चकित कर देने वाले अंदाज में निकालते जब वे किसी आम के पेड़ से माटा का झोंझ (बड़े आकार की पीली चींटियां) उस बैल पर छोड़ देते। अब चुंकि उनके बैल ने बड़ी ख्याति अर्जित कर ली थी अतः कोई भी उसे खरीदने की हिम्मत नहीं करता था।अंततः भगवान कृष्ण की तरह फेक न्यूज से ही उसे बेचने का निदान किया गया जब तीन चार पारंगत फेरहा (गाय बैल बेचवाने के एजेंट) लगा दिए गए। इसके बाद गांव में जब भी कोई खरीदार उस बैल के बारे में पूछता तो लोग उसकी प्रशंसा करने लगते और उसे इन अनिम्प्लॉयड फेरहों के पास भेज देते। ये लोग उस बैल की झूठी प्रशंसा में कहते,”ऊ बैल त हर हेंगा के कुछु ना बूझेला” (वह बैल हल जोतने जैसे कार्य को कुछ नहीं समझता)। ऐसे प्रशंसनीय वाक्यांश को पॉजिटिव अर्थ में लेकर एक खरीदार ने उसे खरीद लिया और उसे लेकर आगे चल पड़ा। अभी वह गांव की सीमा तक ही गया होगा कि बैल ने अपना गुण कौशल दिखाया और उसे पटक दिया। उसके साथ आए लोगों ने जैसे तैसे उस बैल को वापस करने का सोचा पर अब क्या हो सकता था? जब आपने सब कुछ देख समझ कर सौदा किया तो वापसी कैसी? सभी फेरहे अपना कमीशन लेकर वहां डटे हुए थे क्योंकि अगर बैल वापस होता तो उन्हें अपना कमीशन वापस करना पड़ता। उन्हीं में से एक जोर जोर से खरीदारों से कह रहा था, “कहले ना रहनी कि ऊ बैल त हर हेंगा के कुछु ना बूझेला?” (पहले ही बोल दिया था कि ये बैल हल और हेंगा को कुछ नहीं समझता)। ऐसे द्विअर्थी वाक्यांश का खरीदारों के पास कोई तोड़ ही नहीं था अतः उन्हें वह बैल मजबूरन ले जाना पड़ा। आगे उस बैल और मालिक का क्या हुआ कोई नहीं जानता। इस प्रकरणों से आप अच्छी तरह समझ गए होंगे कि शादी ब्याह कराने या बैल बेचने में झूठ बोलने या हवा बांधने जैसे साधन का प्रयोग चिरकाल से होता आया है। हां, एक चीज अवश्य है कि इस हवा बांधने का बहुत ही विशेष परिस्थिति में ही उपयोग किया जाता था। इन छोटे किंतु चुटीले उद्धरणों को अगर आप बड़े संदर्भ या आयाम में देखें तो आज का राजनीतिक परिदृश्य इन्हीं का एक मैक्रोकॉस्म लगने लगता है जहां मीडिया हवा बांधने के विभिन्न विकसित संस्करणों का चुनावों में उपयोग कर रहा है। पूर्व के समय में हवा बांधने वाले या फेरहे बड़े ही कम इसलिए होते थे क्योंकि समाज उन्हें एक हद से ज्यादा प्रश्रय नहीं देता था और उन्हें अच्छा नहीं माना जाता था। अब इनकी फ्रेंचाइजी हर ओर खुल गईं है। मैं भ्रमित हो जाता हूं जब न्यूज चैनलों पर चर्चा करते कुछ लोगों के चेहरे बैल बेचवाने के कार्य में लगे फेरहों से हूबहू मिलने लगते हैं जिन्होंने अपना कमीशन दबा कर हवा बांधना प्रारंभ कर दिया है। आप चुनावों में इनके योगदान को कम कर के नहीं आंक सकते क्योंकि इन्होंने कितने ही खोटे सिक्कों को चला कर नेता बना दिया है।
बहुत सी राजनीतिक पार्टियों भी हवा बांधना सीख गई हैं जिनमें एक प्रमुख पार्टी भी है। दूसरी पार्टियों भी अब धीरे-धीरे सीख रही हैं और अपने पक्ष की न्यूज़ बनाने में पारंगत होने लगी हैं। उदाहरण के तौर पर जैसे स्पिन बॉल या गुगली का जवाब स्पिन बॉल/गुगली ही है उसी तरह फेक न्यूज़ का जवाब फेक न्यूज़ ही है क्योंकि अब कोई सही न्यूज़ फेक न्यूज़ का मुकाबला नहीं कर सकती। ऐसा इसलिए कि फेक न्यूज के उपभोक्ता बहुत अधिक हैं और सही न्यूज़ के बहुत कम। फेक न्यूज बनाने की तर्ज पर बहुतेरे सेमिनार बगैरह भी आयोजित किए जा रहे हैं जो आपकी कमियां छुपा सकें जैसा हम सबने नई शिक्षा नीति के संबंध में देखा है। अब तर्कों की कोई बात ही नहीं करता और कितने जवलंत मुद्दों जैसे गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, बढ़ती हुई जनसंख्या, अर्थव्यवस्था इत्यादि हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। कितने ही संस्थानों में बिना शिक्षकों के खुलेआम नंबर बांटे जा रहे हैं। न शिक्षकों की नियुक्ति हुई है न इस बात का कहीं उल्लेख है कि उनकी व्यवस्था कहां से होगी। लगभग सभी माइनर विषयों में यही हाल है। क्या यही प्रगति का स्तर है जिसे हम इस नई शिक्षा नीति से प्राप्त करना चाहते थे? शिक्षा के क्षेत्र में लगातार घटता निवेश क्या साबित करता है, क्या आंकड़ों पर कभी कोई नजर डालता है और क्या हम दूसरे विकसित देशों से अपनी तुलना कर सकते हैं? कुछएक सेमिनारों को छोड़कर जो सेमिनार हो रहे हैं वहां लोग अपनी आत्मप्रशंसा के अलावा कुछ नहीं कर रहे क्योंकि वहां किसी तार्किक विश्लेषण की जगह ही नहीं है। भारतीय परंपरा के मूल में तो “सा विद्या या विमुक्तये”, “वसुधैव कुटुंबकम”, “एकं सत विप्रा: बहुधा वदंती” और “आ नो भद्रा: कृतवो यंतु विश्वत:” जैसे विचार हैं। श्रीमद्भागवदगीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, “विमर्श एतद्श्लेप्णा, यथोच्छसी तथा कुरु” जिसका अर्थ है कि “हे अर्जुन, मैने तुम्हें सारा विमर्श बता दिया, अब तुम अपने विवेक से जैसी इच्छा करे, निर्णय करो”। इसका अर्थ यह है कि श्री कृष्ण भी अर्जुन पर अपना आदेश नहीं लादते और उन्हें स्वयं निर्णय करने को प्रेरित करते हैं। यही तो वास्तविक अर्थ में मुक्ति है जो हमारा सनातन धर्म हमें बताता है। सातवीं सदी के फ्रांसीसी दार्शनिक रेनी डीकार्ट का सिद्धांत “कोजीटो एरगो सम” (I think therefore I am) तो बहुत बाद में आया जबकि हमारी सनातन परंपरा का तो मूल ही यही है। इसके विपरीत सेमिनारों में ये वक्तागण हमें कुछ ऐसा समझा रहे हैं जैसे हम अपने किसी बड़े ही विकसित काल से पीछे चले गए हैं। ये लोग किसी अलग विचार रखने वाले को बर्दाश्त नहीं कर सकते, यह भी सोचने वाली बात है। जिस दिन हम और आप मुक्त होकर सोचना समझना और बोलना बंद कर देंगे उस दिन सनातन परंपरा का अंत निश्चित है, इसमें कोई संदेह नहीं। जिस परंपरा में द्वैत, अद्वैत, चाणक्य, चार्वाक, हिन्दू, जैन, बौद्ध, दयानंद सरस्वती एवं बहुत से अन्य एक साथ इसी परंपरा में सहभागी रहे हों वहां अपनी समझ दूसरों पर थोपना कहां तक जायज है? मुझे डर है कि अगर लोग ऐसे ही लोग मूक दर्शक होने लगें तो वह दिन दूर नहीं जब यह फेक न्यूज सत्य को ही हमारे जीवन से बाहर निकाल देगा या हो सकता है कि हमारे अंदर सत्य की कोई वास्तविक पहचान बाकी न रह जाए। यह ठीक वैसा ही है जैसे खेतों की खरपतवार बोए गए पौधों को पुष्पित पल्लवित नहीं होने देती।
शायद ऐसे ही एक काल्पनिक प्रांत ओशिनिया की कल्पना जॉर्ज ऑरवेल ने अपने डिस्टोपियन उपन्यास उन्नीस सौ चौरासी (1984) में की है जिसमें नायक विंस्टन स्मिथ वहां के शासक बिगब्रदर के सत्य मंत्रालय में काम करते करते ‘डबलथिंक/थॉटक्राइम’ का शिकार होता है और उसे ‘थॉटपुलिस’ सुधार हेतु महीनों जेल में रखती है ताकि उसके मन में ‘न्यूस्पीक’ और ‘बिगब्रदर’ के प्रति आस्था जागृत की जा सके। जैसे ही वह बिगब्रदर को अपना आराध्य मान लेता है उसे रिहा कर दिया जाता है। ऑरवेल द्वारा बनाया गया शब्द ‘न्यूस्पीक’ फेक न्यूज ही तो है जिसमें विंस्टन स्मिथ को 2+2=5 सिखाया जा रहा है। अमृतकाल और विश्वगुरु जैसे शब्द ‘न्यूस्पीक’ के ही अभिनव प्रयोग लगते हैं। ‘गांधी एक चतुर बनिया थे’ या ‘गांधी को फिल्म बनने के पहले कौन जनता था’ लोगों में भ्रम को बढ़ावा देता है। तब इस उपन्यास में प्रयुक्त ओरवेलियन शब्द ‘डबलथिंक’ और ‘थॉटक्राइम’ बड़े ही समीचीन मालूम होते हैं जब धीरे धीरे लोग फेक न्यूज को ही सत्य मानकर उसपर यकीन करने लगे हैं और जो भी इस फेक न्यूज़ के प्रवचन से अलग सोचेगा उसे ‘थॉटक्राइम’ का दोषी मानकर लज्जित करने की पूरी आजादी बहुमत को है।
मुझे दुख है कि इस फेक न्यूज़ की दुनिया में हाशिए पर खड़ा गरीब कहीं नहीं है क्योंकि उसे तो सच के स्क्रीन पर ही बहुत कम जगह मिली थी तो इस फेक न्यूज के स्क्रीन पर क्या मिलेगी? अब फेक या हवा बांधने जैसा प्रयोग हमारे शिक्षक बंधु और कुलपति इत्यादि भी करने लगे हैं जो पढ़ने पढ़ाने या विश्वविद्यालय की स्थिति सुधारने से ज्यादा फेसबुक या ट्विटर पर अपनी तस्वीर पोस्ट करना ज्यादा आवश्यक समझते हैं और नेताओं को टैग करते रहते हैं। अपनी ग्रेडिंग का प्रचार करने मात्र से या उसके विज्ञापन डालने से कभी स्थिति सुधरी है भला? भाई, हमारा आकलन तो हमारे छात्र ही कर सकते हैं क्योंकि वही हमारे संपर्क में रहते हैं और वही देखते हैं कि किस शिक्षक ने पढ़ाते समय कितनी ऊर्जा खर्च की या उसके हाथ चाक के टुकड़ों से सफेद हुए या नहीं? गहरे सुर्ख रंग के परिधानों या कुर्तों में तो केवल हमारा का छद्म ही झलकेगा। बहुत से संस्थान प्रमुख तो सत्ताधारी दल के इतने करीब हैं कि अब फेक ग्रेड को फेक कहना खतरे से खाली नही क्योंकि अब शिकायत ही किससे की जाय। अतः “सत्यं प्रियं हितं च यत्” का पालन करते हुए मै यह व्यंग्य आलेख अर्पित करता हूं, हो सकता है कहीं कुछ परिवर्तन आए।