सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजरते हुए हम सब कहां से कहां आ चुके हैं। प्रगतिशील लोग खुश हैं क्योंकि उन्होंने गांव जैसी इकाई के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं और उनकी विजय पताका जगह-जगह चौक चौराहों पर बड़े-बड़े लैंप पोस्ट, फव्वारे एवं गगनचुंबी इमारतों के रूप में फहरा आ रही है। अब शहर ही आदमी का सबसे बड़ा ठिकाना है, हर आदमी गांव से शहर की ओर भाग रहा है, कभी ना पूरे हो सकने वाले सपनों की तलाश में। सपनों की तलाश करते करते वह एक ऐसी अवस्था में पहुंच गया है जहां वह गांव में छोड़ कर आई हुई बड़ी चीजों की स्मृति में अब छोटी चीजों से संतोष करने लगा है। आखिर है तो आदमी ही, कंप्यूटर की तरह कोई मशीन तो नहीं जिसमें पीछे जाने या डिलीट का ऑप्शन बड़ी आसानी से उंगलियों में मौजूद रहता है, आप जब चाहे फाइल डिलीट कर दें और उसे रीसायकल बिन में भेज दें, और अगर बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो ‘इम्टी द रीसाइकिल बिन’। पर एक बार रीसाइकिल बिन को इम्टी कर देने के बाद फाइलों के लौट कर आने की कोई गुंजाइश नहीं। पर स्मृतियों की फाइलें कोई जल्दी खाली नहीं करता, मैं भी नहीं, रखे रहता हूं, क्या पता कब कोई कथानक या पात्र मुझे मिल जाए?
दिल्ली में कुछ दिनों के प्रवास के दौरान मैंने बरगद और पीपलो को छोटे रूप में गमलों में उगा हुआ देखा। उन्हें देखकर आश्चर्य के साथ तरस भी आया क्योंकि हमने तो अपने बचपन में उनका विशाल रूप देख रखा था। बोनसाई तकनीकी वृक्ष उगाने की एक जापानी कला है जिसमें वृक्षों की सामान्य वृद्धि को अवरुद्ध कर दिया गया जाता है और उन्हें गमलों में बेचा जाता है जिसे लोग अपने घरों में या बालकनी में रख सके। इन्हें खरीदने वालों को यह गर्व होता है कि वह प्रकृति प्रेमी है और अपनी संस्कृति के रक्षक भी। पीपल और बरगद के पौधों के पास वह आसानी से पूजा पाठ या वट सावित्री व्रत कर सकते हैं। मेरी समझ से यह हमारे ग्रामीण जीवन के एक मैक्रोकॉस्म के माइक्रोकॉस्म में बदलने का दौर है जिसमें सभी बड़ी और जीवन के लिए आवश्यक चीजें छोटी और कम होती गई, जैसे साफ हवा, पानी और खुली जगह, और बरगद या पीपल जो हमारे ग्रामीण जीवन के अभिन्न अंग थे, इतने विशाल होते थे गर्मियों के दिनों में पक्षियों को भोजन, आश्रय और छाया देने के अलावा गांव के लोग दिन भर उसके नीचे डेरा जमाए रहते जब तक दोपहर बीत नहीं जाती। उनकी जड़ें जब भी भूमि को छूने लगती थी तो वहां से एक नए वृक्ष का जन्म होता था, पर बरगद या पीपल अब विलुप्त होने लगे हैं। संकुचित स्थानों में रहने वाले लोग अपनी आत्म संतुष्टि बोनसाई के रूप में उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाकर कर सकते हैं पर अब इक्के दुक्के जगहों को छोड़कर कहीं भी मुझे पुराने स्वरूप के बरगद नहीं मिलते।
कभी-कभी मुझे लगता है कि गांवों में बरगद वृक्ष के रूप में विद्यमान तो थे ही, बरगद जैसे लोग भी होते थे जो दूसरे लोगों को सहारा एवं आश्रय देते थे। आपने भी कुछ लोगों को देखा होगा। बरगद रूपी वृक्ष के मानव रूप में अभी भी उन लोगों के चेहरे मुझे साफ नजर आते हैं जिन्हें मैंने देखा था। उनके द्वार पर कोई भी आ जाए, बिना पानी या भोजन पूछे किसी को नहीं जाने देते, यहां तक कि पशु पक्षियों को भी नहीं। कितने गरीब छात्रों ने अपने गुरु में बरगद देखे, और कुछ अन्य लोगों ने अपने मित्र या रिश्तेदारों में बरगद की छवि देखी जिनकी सहायता से उनका जीवन सफल हो सका। ऐसे ही कुछ संस्थाएं भी बरगद हुआ करती थी जो छात्रों का स्वागत करती थी, उन्हें दुलारती और अपनी छाया में पुष्पित पल्लवित होने का मौका देती थीं, आज की संस्थाओं की तरह नहीं जो अपनी मोटी फीस से छात्रा-छात्राओं को दुत्कारती हैं, भयभीत करती हैं और उन्हें आर्थिक रूप से अपने परिवारों पर बोझ बना डालती हैं। तभी संस्थाओं को मातृ संस्था या अल्मा मैटर कहा जाता था। मुझे दुख है कि बरगद के वृक्षों की तरह ऐसी संस्थाएं भी भी अब नहीं के बराबर हैं। मनुष्य ने सृष्टि को नियंत्रित करने के चक्कर में अपने आपको ही शिकार बना डाला और कंक्रीट से बने इस शहर में अपने को कैद कर लिया! इस अनियंत्रित विकास एवं उल्टी सोच का खामियाजा केवल मनुष्य को ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों और हमारी वनस्पतियों को भी भुगतना पड़ा क्योंकि अत्यधिक फायदा लेने के चक्कर में हमने उनके अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर दिया है।
आपको याद ही होगा कि हमारे पूर्वज कितने बलिष्ठ और लंबे हुआ करते थे, उनकी तुलना आज आप अपने नौनिहालों से कर ले। ठीक उसी तरह जैसे पूर्व के वृक्ष कितने लंबे चौड़े होते थे और आज के वृक्ष इतने छोटे और नाटे। आप लाख उनका ध्यान रखें पर उनकी लंबाई एक निश्चित सीमा से ऊपर नहीं जा सकती। हमारे बच्चे तो यह मानेंगे ही नहीं की हमने पीपल, बरगद और आम के वृक्षों को कितने विशाल रूप में देखा है। उन्हें तो बस बोनसाई का पता है जो उनके फ्लैट में चुपचाप किसी कोने में पड़ा है, न ठीक से सांस ले सकता है, ना अपने को बड़ा कर सकता है।
जो हाल हमने वनस्पतियों का किया है वही हाल हमने उन लोगों का कर दिया है जो सामाजिक ताने-बाने और सरोकार को महत्व दिया करते थे। जो भी राह पर मिल जाए उसके साथ दो चार कदम चलने का शगल उन्हें होता था और बात करने या हाल-चाल जानने का समय भी। ऐसे लोग बड़े कहलाते थे, पर अब यह बात कहां? हम सभी अपने अपने घरों में कैद है और अगर कोई बरगद की तरह मिल भी जाए तो उस पर बंदिशें लगा दी जाएंगी, ठीक उसी तरह जैसे बरगद के पौधे के विकास को रोक उसकी तेजी से बढ़ती हुई जड़ों को काटकर गमले में कैद कर दिया गया है। जब आदमी खुद ही बोनसाई की तरह इतना छोटा हो चुका है तो उसकी सोच कैसी होगी? वह भी संकुचित होगी जो एक सीमा के आगे देख ही नहीं पाएगी कि हम कहां जा रहे हैं। अब चाहे वह शिक्षा का प्रश्न हो, कानून व्यवस्था का हो या प्रकृति के प्रति आदर भाव का प्रश्न ही हो, हर जगह संकुचित सोच ही परिलक्षित होती है। पर हम सभी आत्ममुग्ध हैं, सभी इस नई दुनिया की चकाचौंध में कुछ ऐसे भाव विभोर हो चुके हैं कि हमे यह आभास भी नहीं कि पारा अब पचास के आसपास पंहुंच रहा है और हमने उसे नीचे रखने के सारे उपादान नष्ट कर दिए हैं। आप अपने आस पास किन्हीं दस लोगों से यह प्रश्न करें कि उन्होंने कोई पेड़ पौधे स्वयं लगाए हैं कि नहीं, मैं दावे से कह सकता हूं कि उनमें से आठ तो अवश्य ही मुंह चुराते नजर आएंगे। मैं यहां सरकार या नेताओं के द्वारा लगाए गए पौधों की बात नहीं कर रहा क्योंकि वह तो बस फोटो खिंचवाने के लिए होते ही हैं। बरगद और पीपल के लिए तो जगह ही नहीं बची है अतः उनकी नियति तो बोनसाई बनने में ही है। पर हमारी सोच भी संकुचित होते होते बोनसाई ही बन गई है, इस बात का मुझे गहरा दुख है।
बरगद को बोनसाई बनाने का सफर तो हमने आसानी से तय कर लिया है, मुझे डर है कि कहीं मनुष्य भी आगे चलकर बोनसाई न हो जाए क्योंकि हमने अपने जीवन के टाइमलाइन में कोई पीछे जाने का बटन लगाकर नहीं रखा है। लगातार सिकुड़ने वाली संकुचित सोच उसे कहीं शरीर से भी…?