प्रोफेसर शिवकुमार अपने विभाग में अपने अगले व्याख्यान की तैयारी कर रहे थे। कुछ परेशान भी लग रहे थे तभी विभागाध्यक्ष ने कक्ष में प्रवेश किया। “नमस्कार बंधु, कैसे हैं? सब कुशल तो है न? उन्होंने पूछा।न जाने कैसे उन्होंने प्रोफेसर शिवकुमार के चेहरे पर अंकित परेशानी की रेखाएं पढ़ ली थीं।
“नमस्कार, सब ठीक है सर, आप कैसे हैं?” प्रोफेसर शिवकुमार ने पूछा।
“मैं भी ठीक हूं, क्लास कब है?”
“बस, इसके बाद।”
“अरे हां, कल सेमिनार में गए थे? कैसा रहा?”
“सुना है, वहां प्रोफेसर आनंद कुमार का व्याख्यान बहुत अच्छा रहा। कई लोग उस व्याख्यान की चर्चा कर रहे हैं, और विषय भी उन्होंने अच्छा चुना था, ‘शिक्षकों का धर्म: पुरातन का संदर्भ और आज का निष्कर्ष’, और उनकी इस विषय पर चर्चा भी बहुत अच्छी थी।”प्रोफेसर शिवकुमार ने भी उस व्याख्यान को सुना था पर न जाने क्यों उनका व्याख्यान नई शिक्षा नीति के परिपेक्ष में में उन्हें थोड़ा अटपटा लगा था। संपूर्ण परीक्षा प्रणाली के वस्तुनिष्ठ हो जाने के कारण अब शिक्षक शिक्षक ही कहां रह गया था? डॉ शिवकुमार कभी-कभी मन ही मन अपनी तुलना विश्वविद्यालय परीक्षा भवन में बैठे लिपिकों से करने लगे थे जो दिन-रात फाइलें इधर से उधर करने में लगे रहते हैं। उन्हें भी छात्र-छात्राओं के असाइनमेंट्स की जांच करते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव होता था जब वह छात्र-छात्राओं की ज्ञान पर अपना ध्यान केंद्रित करते। सभी असाइनमेंट्स करीब-करीब आपस में मिल रहे होते और कई तो हूबहू किसी वेबसाइट की नकल लगते, पर किया भी क्या जा सकता था? व्याख्यात्मक उत्तर पुस्तिकाओं और डिसर्टेशंस में भी इतनी अशुद्धियां रहतीं कि उसे जांचने की इच्छा ही नहीं होती, मन करता कि वह पूरी पुस्तिका को अपनी कलम से लाल कर दें, विडंबना यह की यह हाल स्नातकोत्तर और पीएचडी कर रहे के छात्रों का था। शोध की तो हालत और बुरी थी क्योंकि पीएचडी बांटना अब एक प्रचलित धर्म हो गया था। जहां देखो वहां पीएचडी छात्र । वह सोचने लगते कि जिस छात्र को भाषा का ही ज्ञान नहीं, उसके ज्ञान और व्यक्तित्व पर क्या गौर करना भले ही उसके पास नेट-जेआरएफ का प्रमाण पत्र हो । अब तो स्नातक की कक्षाओं में उपस्थित इतनी कम होने लगी थी कि उन्हें बड़ी चिंता होने लगती। कभी-कभी तो उन्हें अनुभव होता कि वह धीरे-धीरे शिक्षण कार्य ही भूलते जा रहे हैं, कहीं ऐसा समय तो न आ जाएगा जब उन्हें यह विधा याद ही न रहे। यही उनकी चिंता का कारण था पर वह इसमें कुछ भी नहीं कर सकते थे । शुरुआत में जब छात्र कम होने लगे तो उन्होंने अपने व्याख्यान की तैयारी और अच्छी तरह करनी शुरू कर दी, पर हुआ कुछ नहीं, धीरे-धीरे छात्र और भी कम होते जा रहे थे, कभी चार, कभी पांच और अगर किसी दिन बहुत अच्छा संयोग रहता तो कभी दस या बारह. पहले तो ऐसा कभी नहीं था, कक्षाएं खचाखच भरी रहती, कभी-कभी तो संख्या डेढ़ सौ तक चली जाती पर आज…यह देखकर उनका मन बहुत दुखी होता।
उन्हें याद आ रहा था कि प्रोफेसर आनंद कुमार ने अपने व्याख्यान में योगेश्वर से अपनी चर्चा प्रारंभ करके गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र, परशुराम और गुरु द्रोण से होते हुए आजकल के गुरुजनों पर अच्छी चर्चा की थी पर न जाने क्यों प्रो शिवकुमार को इन गुरुजनों में से गुरु परशुराम और गुरु द्रोण गुरुधर्म के आदर्श कभी नहीं लगे, हां, यह बात और थी कि योगेश्वर की चर्चा में जब उन्होंने शिव और कृष्ण दोनों को योगेश्वर के रूप में समाहित कर दिया था तब उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई थी पर आज के संदर्भ में योगेश्वर की चर्चा समीचीन नहीं थी।
डॉ शिवकुमार को गुरु परशुराम का अपने शिष्य के प्रति जो व्यवहार था बिल्कुल उचित नहीं लगता था। माना कि अंगराज कर्ण ने उन्हें शिष्य बनने के पहले अपनी जाति नहीं बताई लेकिन इस अपराध का इतना बड़ा दंड कि सारी शिक्षा देने के बाद आप उसे श्राप दे दें और उसी श्राप के कारण उसकी मृत्यु हो जाए। क्षणभर को अगर मान ले कि कर्ण ने उन्हें शुरुआत में ही अपनी जाति बता दी होती तो क्या गुरु परशुराम कर्ण को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लेते? यहां प्रश्न यह था कि गुरु को क्या जाति देखकर अपना निर्णय करना चाहिए, और अगर वह जाति देखकर निर्णय करता है फिर धर्म कैसा? कुछ ऐसे ही प्रश्न गुरु द्रोण पर भी उठने लगते कि उन्होंने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन के भविष्य की खातिर एकलव्य का जीवन नष्ट कर दिया और उससे गुरु दक्षिणा में उसका अंगूठा मांग लिया जबकि उन्होंने कभी भी स्वयं उपस्थित होकर उसे शिक्षा नहीं दी थी। धनुर्विद्या तो एकलव्य ने स्वयं प्राप्त की थी फिर उससे गुरु दक्षिणा मांगना कहां तक उचित था? राजसत्ता की अंधभक्ति में गुरु द्रोण अपना गुरुधर्म भूल चुके थे और उनका व्यवहार उन्हें कुछ-कुछ शकुनि की तरह लग रहा था।
प्रोफेसर आनंद कुमार के व्याख्यान का उत्तरार्ध आज के गुरुजनों से संबंधित था। उनकी बात अक्षरश: सही थी कि बहुत से गुरुजन विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में अपनी पहुंच बनाने हेतु अपनी कक्षाओं पर ध्यान नहीं देते। वे शोध और अध्ययन को तिलांजलि देकर विभिन्न कमेटियों में अपना नाम डलवाने को उत्सुक रहते और इस कारण वह विश्वविद्यालय अधिकारियों के चापलूस बन गए थे और सरस्वती से विमुख होकर लक्ष्मी की उपासना कर रहे थे। उनमें कितने तो समय से कक्षाओं में आते ही नहीं और आते भी तो इस तरह आते जैसे उनके जैसा ज्ञानी कहीं दूसरा मौजूद नहीं और यह दावा भी कर देते कि वे जल्दी ही कहीं न कहीं कुलपति अवश्य बन जाएंगे। आनंद कुमार के अनुसार शिक्षक के लिए आजीवन एक छात्र बने रहना बहुत ही आवश्यक था अन्यथा उसके निरंतर ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा ही खत्म हो जाएगी। अतः सवाल वहीं का वहीं था कि गुरुधर्म पर चलने वाला गुरु कौन है?
प्रोफेसर शिवकुमार इन सब विषयों पर विचार करते हुए जैसे अभी भी किसी आदर्श की तलाश में थे। तभी उन्हें अपने गुरु प्रोफेसर के सी भट्टाचार्य की याद आने लगी जिन्होंने उन्हें महाविद्यालय में पढ़ाया था। वे नाटे कद के थे और उनके चश्मे का बढ़ा नंबर चश्मा देखते ही पता चल जाता था। कोई कह नहीं सकता था कि कभी प्रोफ़ेसर भट्टाचार्य विलंब से कक्षा में आए हों। हाथ में दो तीन किताबें अवश्य होतीं और जब पढ़ाने लगते तो ऐसा लगता कि शेक्सपियर और मिल्टन उनसे संवाद कर रहे हों। छात्रों को आनंद आ जाता, कविताओं की पंक्तियां मुंहजबानी सुनाने लगते और पढ़ाते समय उनकी भाव भंगिमा ऐसी लगने लगती कि जैसे वह हैमलेट की कहानी में डूब गए हो और उसी के साथ क्लॉडियस के छद्म से जूझ रहे हों। एकदम लाग लपेट से दूर, राजनीति से दूर, जैसे शिक्षण कार्य ही उनका मोक्ष था और वे उस की प्राप्ति कर संतुष्ट रहते। पूरी तरह सादा जीवन और अगर किसी इंटरव्यू में चले भी जाएं तो हमेशा उसी का साथ दें जो उस पद के लायक हो। कितनी बार तो कुलपतियों से लड़ जाते कि एकदम उत्तम व्यक्ति का ही चयन होना चाहिए। यह देखकर बहुत सारे विश्वविद्यालयों ने उन्हें बुलाना ही बंद कर दिया था। उनके बारे में एक किंवदंती भी प्रोफेसर शिव कुमार ने सुन रखी थी। एक बार किसी कारण उस दिन उनकी कक्षा में कोई छात्र नहीं आया था। प्रोफ़ेसर भट्टाचार्य कक्षा में पूरे पैंतालीस मिनट बैठे रहे, अध्ययन करते रहे और अपने छात्रों का इंतजार करते रहे। प्रो भट्टाचार्य की अपनी कोई संतान नहीं थी, शायद उन्हें अपने छात्र ही अपनी संतानों की तरह लगते होंगे।
अपने गुरु की स्मृति में प्रोफ़ेसर शिवकुमार को अपना आदर्श मिल गया था। वह जीवित न होते हुए भी उनका मार्गदर्शन कर रहे थे। उन्हें अब पिछले इतिहास में जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। शायद प्रो आनंद कुमार को उनके गुरु के बारे में कुछ पता नहीं था, नहीं तो वह पुराणों, त्रेता और द्वापर युग के गुरुजनों की कोई बात न करते। तभी कक्षा की घंटी बजी । प्रो शिवकुमार के कक्षा में जाने का समय हो चुका था। वहां जाकर उन्होंने देखा कि आज कोई छात्र मौजूद नहीं है। बिना इधर-उधर देखे उन्होंने अपने गुरु की स्मृति को नमन किया और चाक से शेक्सपियर के नाटक एज यू लाइक इट की प्रसिद्ध पंक्तियां “आल द वर्ल्ड इज ए स्टेज/एंड ऑल द मेन एंड विमेन मेरेली प्लेयर्स/ दे हैव देयर एक्सिट्स ऐंड एंट्रेंसेज” ब्लैक बोर्ड पर लिखा और पढ़ाना शुरू कर दिया जैसे वहां रखी मेज और कुर्सियां उन्हें सुन रही हों और वे उनसे प्रश्न पूछ रही हों। सारा वातावरण जीवंत हो चला था और प्रोफ़ेसर शिवकुमार को उनके मोक्ष की प्राप्ति हो चुकी थी। उन्हें आज छात्र छात्राओं के रहने न रहने की कोई चिंता नहीं थी। उन्हें संतोष था कि उनकी शिक्षण विधा अब कोई छीन नहीं सकता था क्योंकि आज उसमें एक अलग ही निखार आ गया था।
उनके विभागाध्यक्ष और अन्य सहयोगी द्वार पर उन्हें मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे।