गंगा तुम अविरल ही रहना
तीर्थो के सारे घाटों पर
कलकल बहती रहना
तुम ही तो हो मोक्षदायिनी
तुम ही तो हो पतित पावनी
तुम ही तो हो भरत भूमि की
सब नदियों का गहना
गंगा तुम अविरल ही रहना।
तुम भारत की जीवनरेखा
तुम काशी का भूषण
तुम प्रयाग की कुंभवाहिनी
करती सबका पोषण
बीती सदियों में क्या क्या बीता
सबकी हो तुम साक्षी
क्या क्या घटा कभी घाटों पर
देखी हर परिपाटी
किसके किसके पाप धुले हैं
किसके रह गए बाकी
सच अब तुम ही कहना
गंगा तुम अविरल ही रहना।
क्या अब भी पुष्पों की माला
करती तुमको हर्षित?
अर्पित दीपों की अवलि विशाला
करती है आनंदित?
अवतरण हुआ था जब से अब तक
कितने बदले भूप
भारत की तुम धर्म ध्वजा हो
और ऐसा कलुषित रूप?
सच अब तुम ही कहना
गंगा तुम अविरल ही रहना।
आहत हूं अपने अंतर में
कुछ भी ना कर पाता
रोज देखता कलुष यहां जब
तेरे तट पर आता
दृष्टि वहीं पर गड़ जाती है
हार है जाता ज्ञान
कैसे आखिर करते हैं हम
अपनी मां का सम्मान?
हाथों से कितना कलुष उठाऊं
कितना भ्रम अज्ञान
क्या हर हर गंगे कहने भर से
हो जाता मां का मान?
मर्यादा तेरी भूल गए हम
थोथा है अभिमान
कर्म मर्म से जुड़ा नहीं जब
तो कैसा तेरा मान?
सौंप रहा नव पल्लव हाथों
तेरी महिमा का गान
मां! तुम क्षमाशील ही रहना
गंगा तुम अविरल ही बहना।