हर समय बहार का मौसम नहीं होता
हर दिवस भी प्यार का मौसम नहीं होता।
कभी तो गर्मियां भी खूब लोगों को सताती हैं
कभी तो बारिशें भी आसमां से रूठ जाती हैं।
कभी जाड़ों की कंपाती ठंढ सबको बेध जाती है
या पतझड़ का महीना खींचता अपनी पनाहों को।
कभी यूं लग रहा होता कि रातें बहुत लंबी हैं
कभी तो ये भी लगता अब सहर फिर से नहीं होगी।
थका सा आदमी ये मानकर खामोश रहता है
कि मौसम भी कहीं पर हर समय एक सा नहीं रहता।
खिले हैं फूल फिर से रेत पर ये हमने देखा है
कि बंजर भी तो हर एक साल में बंजर नहीं रहता।
पुनः प्रारंभ करना, बीज बोना किसने रोका है?
पाला भी गिरे गर श्रमिक तो बैठा नहीं रहता।
हर समय बहार का मौसम नहीं होता…