जब एक चराग़ बुझ गया तूफान हंस पड़ा
उसने समझा अब कहीं चराग़ नहीं।
जगनुओं को देकर कसम चराग़ों ने
अंधेरी राह पर फिर से उजाले कर दिए।
वो उजालों का निगहबान होता जाएगा
जो अंधेरों में पशेमान होता जाएगा।
बस एक ज़ुबान की चाहत है इन उजालों को
अंधेरे देर तक मेहमान नहीं होते हैं।
थर थर कांप रही है लौ, पर जिंदा है
देर तक वो भी अंधेरों का भरम रखती है।
तुम चराग़ न सही, जुगनू ही चलो हो जाना
जिसमें न तेल है, न दिया है, न बाती है।