हम मानव संक्रांति काल केमूल्यों के अवसान काल केनए पुराने दो पाटों मेंसामंजन बैठाया करतेसंबंधों की डोर न टूटेखुद का जी बहलाया करतेहमने है पितरों से सीखाऊंचाई पर गर्व न करनाअपनेपन के आलिंगन मेंसब को लेकर साथ है चलना। अर्जन की कमी खलती हैमन में कोई कमी ना आईअपना खो कर सबको पायामन में लेकिन क्लेश ना आयानैतिकता का मोल बड़ा हैसोच में कोई आंच न आईआज इस संक्रांति काल मेंजीवन मूल्यों का मोल नहीं है। कोई...
मिल्कियत
कितने बदल गए हम भीप्यास ही जिंदगी कर लीमौसम से रंज कर बैठेऔर फूलों से दोस्ती कर ली। क्या मिला, न मिला, देखे कौन?कौन इतना हिसाब कर डालेहै फुर्सत किसे जो वणिकों साअपना मिज़ाज कर डाले? जफ़ा वाले सोच में रहतेकि पत्थर का जवाब पत्थर हैमैंने रिवायत पलट कर रख डालीफूलों में जवाब कर डाला। लगा लो मिल्कियत का हिसाबमैंने पलड़े ग़ज़ल को रख डालातुम जो चाहो तुम रख डालोमैंने अपनी शग़ल को रख डाला। अब देखें कहां ले...
ओस
ओस की एक बूंदगिरी घास परकोने पर अटकीथोड़ी सी ठिठकी। फिर बोली मुझसेतू क्या देखे मोयपल ही जीवन मेरासाथ न आया कोय। फिर भी मैं हंसती हूंहीरे सी चमकती हूंसतरंगी रंग लिएकिरणों का संग लिए। एक ठंडा शीतल साकोमल एहसास मेराजैसे कोई सपना होपल भर इतिहास मेरा। यह दूब हरित चादरछोटा आकाश मेरासूरज के चमकते हीपानी बन जाऊंगी। तुम आए धरती परएक लंबी उम्र लिएफिर भी हो संशय मेंहै क्या प्रारब्ध तेरा? जीवन तेरा...
यायावरी
बीत गई रात रीआ गई यायावरीआज यहां कल वहांफक्कड़ों का राज री।
जिंदगी में आ गईअलग सी एक रास रीबंधनों से मुक्त जैसेहो रही मन की लड़ी।
ह्रदय में उल्लास जैसेवसंत का हो राग रीलेखनी भी मस्त होकरलिख रही जिंदादिली।
समय में बदलाव कीछा गई है ताजगीआज जाना मैंने खुद कोरोज ही नव गान री।
मरासिम
जिंदगी सरपट गुजरती जा रही हैजैसे कोई हो रेलगाड़ीआ भी रहे हैं लोगजा भी रहे हैं लोगहर आदमी अपने मरासिम जी रहा है।
सभी जल्दी में कितने आजकल हैं?रिश्ते भी दूरभाषी हो गए हैंइच्छाएं स्वप्न में अब ढल रहीं हैंदूरियां तो मिट गईं भूगोल कीपर उम्मीदें कितनी खाली हो गईं हैं।
सुबह से शाम तक हम राह तकतेकहीं मुस्कान में छल हैकहीं पहचान दुर्बल हैएक दूसरे से अब किनारा हो गया हैआदमी टूट कर कितना बेचारा हो गया है।
शब्द ही मिले नहीं
न जाने कितने भावों कोकभी शब्द ही मिले नहींन जाने कितने गीतों कोकभी राग ही मिले नहीं। उमड़ कर बदलियां कितनीबरसी नहीं मरू में भीन जाने कितने फूलों कोदेखा नहीं किसी ने भी। क्या हिसाब तारों काजो टूट कर बिखर गएक्या हिसाब आहों कामिला कोई भी सिला नहीं। भ्रमर भी घूम कर लौटेकभी रस बिना ही उपवन सेकितने ही मृग दिशा खोकरसमूह से बिछड़ गए। न जाने कितने साधक कोसाध्य ही मिला नहींजो सदा व्याप्त घट घट मेंपास ही...
रिश्ते
अब कोई मेहमान रुक नहीं पाताझट से आता है चला जाता है।
अभी तो पुरसाहाल भी न पूछा मैंनेफिर आऊंगा, नहीं है वक्त सुना जाता है।
समय की भेंट चढ़े सब रिश्ते मेरेजिंदगी रेत के मानिंद फिसल जाती है।
दिल हो गए अब दूर कि तलबगारी मेंउनका आना भी एक जख्म लगा जाता है।
मैं भी हूं, वे भी है, सब कुछ तो है दुनिया मेंमेरा घर खाली है, खाली ही रह जाता है।
सुधर जाइए
अभी भी समय है सुधर जाइएबहुत लंबा सफर है सुधर जाइए।
देख लो लालिमा पूर्व में दिख रहीजल्द होता सहर है सुधर जाइए।
आंधियां कब रही किसी कैद मेंरात अंतिम पहर है सुधर जाइए।
नफरत की खेती बुरी चीज हैबीत जाए न खुद पर सुधर जाइए।
यह माना नशे में है ताकत बहुतपर जल्दी उतरता सुधर जाइए।
जाने कितने घरौंदे यूं ही टूटतेदर्द देता कहर है सुधर जाइए।
तल्ख़ियां कब तलक गूंजती रह गईउसकी सब पर नजर है सुधर जाइए।
सब चले गए
सब चले गएजितने थे…नेह के, स्पर्श केताप के, संघर्ष केप्रतिबिंब चले गए। वो छोटा सा घरौंदाक्षिति परमिट्टी का चूल्हाकुछ सोंधा सोंधा साखदर कर बह गया जोबारिश के थपेडों में कभी का। वो मां की हथेली और आंचलजो हमे था सिक्त करतावो दादी, खुद कहानी बन गईंलोरी सुना करपोते के सिर पर फिर रहे वो हाथबाबा के, कुछ खुरदरे सेउंगलियां जो सिंक गईं होरहा लगातेबाप के कंधे, कराते जो सवारीपीढियों का एक होना परस्परजूझना...
रेत के शहर में
नया सा पुष्प किसी भी डाल परनया पल्लव किसी भी टहन परहरी सी दूब मृदा की छाल परउगेगी क्या रेत के शहर में? प्रेम की किरण मन के क्षितिज परनई मुस्कान किसी के अधर परनया संगीत किसी भी ताल परसजेगा क्या रेत के शहर में? मैं खुद सृष्टा हूं ऐसे तंत्र कामैं खुद दोषी हूं भूले मंत्र कामनुज से मनुज बिल्कुल विलग सा हैफलेगा क्या रेत के शहर में? कैसे परिजन, क्या कुटुंब की कल्पनाबड़ों का संग, धर्म की अल्पनासभी भूले...