आज कहानी प्रारंभ करने के पहले मोबाइल देवता को नमन कर लेता हूं क्योंकि यह कहानी उन्हीं पर है। आपको याद होगा गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में सबसे पहले देवताओं की वंदना की है, फिर बाद में स्वांत: सुखाय पर बात खत्म की है। आज का विषय कुछ ऐसा ही है, कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मोबाइल देवता कलयुग में साक्षात परमेश्वर के अवतार है क्योंकि धरती पर किसी देवता के आने का प्रभाव सभी मनुष्यों पर पड़ता है। क्या आपको लग रहा है कि मैं गलत कह रहा हूं? इनका प्रभाव तो वास्तव में हर जगह है। घर, गली, मोहल्ला, देश, परदेस, सभी जगह इनकी महिमा व्याप्त है, कोई जगह अछूती नहीं, यहां तक कि मेरे कहानी लेखन में भी, क्योंकि इनके बिना तो मेरी लेखनी चल ही नहीं सकती, अरे भाई, मुझे हिंदी टाइपिंग जो नहीं आती।
अभी कल ही मेरी श्रीमती जी बिटिया से बात कर रही थीं और मेरी शिकायत कर रही थीं, “मत पूछो, कॉलेज से आने के बाद मोबाइल में लग जाते हैं, दिन-रात उसी में रहते हैं, हद हो गई है इनके कहानी लेखन की, घर का कोई काम याद नहीं रहता और कभी-कभी तो मैं कुछ कहती हूं तो इन्हें सुनाई भी नहीं देता, कान में ईयर फोन लगाए रहते हैं, इत्यादि, इत्यादि।”
उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ रही थी क्योंकि वह भी खाली समय में अपनी सहेलियों से मिलकर आने के बाद यही करती हैं, मेरे बगल में बैठे-बैठे उनके सामने मोबाइल में कुछ सीरियल्स खुले रहते हैं और उसमें मगन रहती हैं, खैर, पत्नी की शिकायत किससे की जाए, हिम्मत जुटानी पड़ती है? गनीमत है, अभी वे लर्निंग मोड में हैं, नहीं तो ना जाने क्या होता?
उनके इस वार्तालाप ने मेरे सामने मेरे जीवन के पिछले पन्ने अचानक खोल दिए और मुझे अपना बचपन याद आने लगा जब हमारे पास स्कूल की छुट्टियां के बाद क्रिकेट खेलने या कहीं पैदल ही घूम आने के अलावा कोई काम नहीं होता था। उस समय मैं केंद्रीय विद्यालय जवाहर नगर में कक्षा सातवीं का छात्र था। घर में बस रेडियो था, टेलीविजन नहीं था। कुछ-कुछ एशियाड होने की चर्चा चल रही थी और लोग कह रहे थे कि टेलीविजन अब घरों में पहुंचना शुरू हो जाएगा। छुट्टियों में गांव आने के पश्चात मेरे गांव के साथी मुझे घेर लेते जैसे मैं कोई सेलिब्रिटी की तरह उनके बीच आ गया हूं। मैं उनके साथ उनके स्कूल भी गाहे-बगाहे चला जाता जहां वह बड़े गर्व से अपने शिक्षकों से कहते, “इनसे अंग्रेजी में पूछीं गुरुजी”, और फिर वहां के शिक्षकों के द्वारा कुछ पूछने पर कुछ कविताएं उन्हें दनादन सुना देता। उनके साथ गाय चराने भी चला जाता, और वहां तालाब के किनारे बहुत तरह के खेल होते, चीका, गुल्ली-डंडा, आइस-पाइस और सतिल्लो इत्यादि, गर्मी होने पर तालाब में तैरान होती और कभी-कभी तो उसमें भी गेंद उछाल दी जाती और हम सब आनंद से भर जाते। भूख लगने पर कुछ आम के टिकोरे तोड़कर उसकी भुजरी बनती जो मिर्च के अचार के साथ बहुत स्वादिष्ट लगती। पके आम के मौसम में तो पूछना ही क्या। ऐसा ही कुछ आपने भी किया होगा, याद करें।
मेरे पिता सेवानिवृत्ति के बाद गांव में ही रहते थे, सुबह चाय के समय गांव के छ:-सात लोग उनके साथ जरूर होते । उनका शाम का समय रामचरितमानस पढ़ते हुए बीतता था, और कभी अगर बिंदेश्वरी बाबा आ जाते तो उनका आनंद और बढ़ जाता और वहां बैठकर चर्चा सुनने वालों की फेहरिस्त लंबी हो जाती। वह रामचरितमानस की चौपाइयां पढ़ने लगते और बिंदेश्वरी बाबा उनकी व्याख्या बड़े सारगर्भित रूप से करने लगते। पिताजी कभी-कभी खेतों की ओर निकल जाते और हर समय एक संतोष का भाव उनके चेहरे पर झलका करता। कभी किसी चीज की चिंता उन्हें परेशान नहीं करती थी, बच्चों का पास न होना भी जैसे सब कुछ उन्होंने अपने आराध्य देव बाबा विश्वनाथ पर छोड़ दिया हो। तब अंतर्देशीय और पोस्टकार्ड का जमाना था और चिट्ठीयां पंद्रह से बीस दिन बाद तक मिला करतीं जैसे कोई जल्दी ही न हो।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र जीवन मैं अपने गांव दो-तीन महीने बाद ही जाया करता , हां, मेरी मां मेरे कुशल क्षेम के लिए जरूर परेशान रहती, पर मेरे पिता बिल्कुल भी नहीं। मेरी बहनें भी बहुत दूर थीं, उनके यहां कोई महीने दो महीने पर ही जाता। कुछ रिश्तेदारों से तो मुलाकात ही साल डेढ़ साल पर होती जब कोई शादी ब्याह होता, और अगर कोई घर से दूर चला गया तो उसका इंतजार तो होता, लेकिन आजकल की तरह घबराहट कभी नहीं। आप आज की तुलना उस समय से कर लें, आज एक दिन भी अगर बच्चों से बात न हो, तो हम कितने परेशान हो जाते हैं। मैंने भी कुछ दिन रामचरितमानस पढ़कर अपनी मां को सुनाया था जब वह चलने में असमर्थ हो चुकी थी, पर जाने क्यों मुझमें अपने पिता की तरह एकाग्रता नहीं थी, और मेरा मन बार-बार मोबाइल पर आते हुए मैसेजेस पर जा रहा था जैसे मोबाइल देवता मुझसे पूछ रहे हों, हे वत्स, तुम कहां फंस गए?
अतः सब जगह मोबाइल देव की माया है, इसलिए उनका नमन रोज आवश्यक है क्योंकि आज जिधर देखो उधर वह अपने भक्तों से संवाद करने में लगे हैं। भक्तजन उनके मंदिर के द्वार पर खड़े हैं और वह न जाने कितने रूपों में उन्हें अपना दर्शन दे रहे हैं, कुछ-कुछ द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण की तरह जो बहुत सारे गोपियों को एक साथ दर्शन देते थे। हम सभी मंत्रमुग्ध हैं। बेटा, बेटी, पत्नी, भाई, बंधु, सब। यहां तक कि तीन साल के बालक सारांश भी, बिना देवता का दर्शन किए न खा सकते हैं, ना पढ़ सकते हैं और ना खुश रह सकते हैं। और तीन महीने के नैवेद्य की तो बात ही मत करिए, वह तो अभी से मोबाइल को उंगलियों से हिट एंड ट्रायल मेथड पर ले चुके हैं। स्थिति तो यहां तक हो चली है कि अब मोबाइल देवता ने गुरुजनों को भी नौकरी से हटाना शुरू कर दिया है क्योंकि ऑनलाइन एजुकेशन आ जाने के बाद अब शिक्षकों की जरूरत ही कहां है? सारा ज्ञान यूट्यूब और गूगल पर उपलब्ध है।
आज कोई पिता अपने बच्चों से मोबाइल बंद कर पढ़ने को नहीं कह सकता क्योंकि उनकी नाराजगी उसे अपनी स्थिति का एहसास करा देगी। आप उनके मोबाइल को देख नहीं सकते क्योंकि उसमें ऐसे पासवर्ड लगे हैं जिसको खोलना आप के वश की बात नहीं, और अगर मान लिया कि आपने उसे खोलने का प्रयत्न भी किया तो वह मोबाइल आपकी तस्वीर खींच लेगा जिससे आपके बालक को पता चल जाएगा कि आपने यह प्रयास भी किया है, और फिर आपकी शामत। आपको मालूम होना चाहिए कि यह मोबाइल देवता अपने भक्तों का बहुत ख्याल रखते हैं। आप खर-दूषण जैसे लोग अगर देवता और भक्तों के बीच में रोड़ा बन रहे हैं तो उनके पास आपको ब्लॉक या अनफ्रेंड करने का ऑप्शन तो है ही। इसलिए आपको मेरा सुझाव है कि आप अपने मोबाइल से अपना भक्ति भाव जोड़ें, अपने देवता से अपनी बात करें, दूसरों की तपस्या न भंग करें। बच्चों के मामले में ज्यादा ताक झांक करना आपको शोभा भी नहीं देता, यह तो पूर्व के कम पढ़े लिखे मां बाप किया करते थे जो अपने बच्चों की अच्छे से ठुकाई भी किया करते थे ताकि उनका दिमाग सही रहे। सो, हैव सम कॉमन सेंस माय फ्रेंड… हैव सम कॉमन सेंस ।
आप लोग कहते हैं आज एंप्लॉयमेंट कम हो गया है, मैं तो समझता हूं कि सरकार ने मोबाइल देकर के हम सभी को एक ऐसे एंप्लॉयमेंट से जोड़ दिया है जो दिन रात चला करता है, हां उसके बदले हमें पैसे नहीं मिलते, यह बात और है, पर कुछ तो अवश्य मिल रहा है जिसका हमें पता नहीं, आखिर हम इसमें लगे क्यों रहते हैं, हर व्यक्ति बिजी हो चला है? तो अगर सरकार यह कहती है कि हमने बीस करोड़ रोजगार दे दिए तो गलत क्या कहती है? इनके बिना आप एक दिन रह कर देख लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि इनकी महिमा क्या है। बहुत से लोगों को तो अपने घर का टेलीफोन नंबर भी याद नहीं, पहाड़ा तो छोड़ दीजिए, वह तो कल की बात हो चली है । डिजिटल क्रांति के युग में मस्तिष्क से डिजिट गायब हो गए, अब एथिकल कोई सवाल मत पूछ लीजिएगा। यहां तक कि त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश अब मोबाइल देवता के आगे हार चुके हैं क्योंकि मंदिरों में भक्तजन उनकी पूजा करते समय मोबाइल देवता का ध्यान ज्यादा करते हैं, उनका कम। हमारे आराध्य शिव तो और भी परेशान है क्योंकि रुद्राभिषेक होते समय श्रृंगी से दूध अर्पित करने पर कम, मोबाइल से फोटो भेजने पर ज्यादा ध्यान रहता है, क्योंकि, “सब मोबइलवे में बाऽ।”
बहुत ही अच्छा विषय, हास्य और वास्तविकता से परिपूर्ण।