डॉ शिवकुमार अपनी कक्षा लेकर वापस आ अपने कमरे में बैठे ही थे कि उन्हें अनुचर ने एक महत्वपूर्ण बैठक की याद दिलाई। बैठक आइक्यूएसी की थी और यह बैठक उन्होंने ही बुलाई थी। विगत कई वर्षों से वह आइक्यूएसी समन्वयक के रूप में कार्य कर रहे थे और उन्होंने विभिन्न प्रवक्ताओं का प्रमोशन भी पूरे मनोयोग से कराया था। बैठक का एजेंडा नया यूजीसी नियमन निश्चित था जिसके अनुसार अब शिक्षकों का प्रोफेसर पद पर प्रमोशन होना था। नए प्राचार्य अभी-अभी आयोग से चयनित होकर वहां आए थे अतः वह इस नए स्थान और इस नई व्यवस्था में धीरे-धीरे अभ्यस्त हो रहे थे। डॉ शिवकुमार ने नया यूजीसी नियमन अभी-अभी पढ़ा था और उसे पढ़कर वह बहुत प्रसन्न नहीं थे। वह उस महाविद्यालय की सबसे वरिष्ठ शिक्षक थे, आचार्य का पद उन्हें करीब सत्रह साल पहले मिल जाना चाहिए परंतु चुंकि महाविद्यालयों में आचार्य का पद था ही नहीं, वह पूरे मनोयोग से अपनी कक्षाएं लेते और संतुष्ट रहते। इस नए नियमन ने उन्हें परेशानी में डाल दिया था क्योंकि उसमें एपीआई (एकेडमिक परफारमेंस इंडिकेटर) का प्रावधान था। इसमें शिक्षण कार्य के इतर पुस्तक एवं शोध प्रपत्र प्रकाशित करने में एवं दूसरी जगहों पर सेमिनारो में भाग लेने पर अंक प्राप्त होने थे। डॉ शिवकुमार पिछले सात सालों से आइक्यूएसी समन्वयक एवं परीक्षाओं का भी कार्य कर रहे थे अतः उन्हें इन सब चीजों के लिए समय ही नहीं मिलता था। उनका रिटायरमेंट भी नजदीक आ रहा था । बैठक के दौरान प्राचार्य महोदय डॉ शिवकुमार के चेहरे पर परेशानी का भाव स्पष्ट देख सकते थे परंतु सबके सामने कुछ पूछना ठीक नहीं था। उनका शिक्षण अनुभव तो डॉ शिवकुमार से कम था परंतु वह एक मंजे हुए खिलाड़ी थे। कोई भी काम कैसे हो सकता है इसका अनुभव उन्हें पूरा-पूरा था। कुछ दिनों पहले ही तो उन्होंने आयोग को अपने एपीआई और उसके उसमें निहित कागज के खेल से परिचित कराया था। बैठक खत्म होने के बाद उन्होंने डॉ शिवकुमार से पूछा?
“कोई परेशानी है क्या?”
“नहीं, कोई नहीं”, डॉ शिवकुमार सकुचाते हुए बोले।
प्राचार्य महोदय के मन में उनके प्रति सम्मान एवं आत्मीयता तो थी परंतु वह उन्हें यूं ही कोई सूत्र नहीं देना चाहते थे। डॉ शिवकुमार अपनी परेशानी किस से कहें? उनके अब तक केवल तीन ही पब्लिकेशन थे, उन्हें आठ की और आवश्यकता थी, यह इतने कम समय में संभव नहीं था । वह लगातार सोचे जा रहे थे, कभी-कभी उन्हें यह भी लग रहा था कि गलत प्रपत्र देने से सहयुक्त आचार्य रहना ही ठीक है। यह बात वैसे तो ठीक थी परंतु यह कि उनके कनिष्ठ सहयोगी उनसे वरिष्ठ हो जाएंगे उन्हें साल रही थी। उनसे पंद्रह साल कनिष्ठ डॉ विश्वगुरु और डॉ कृष्ण सिंह के पास बहुत सारी एपीआई ईकट्ठा थी भले ही शोध कार्य हेतु आवश्यक तर्कशक्ति उनमें नहीं थी, पर अपने कनिष्ठ सहयोगी से अपनी बात कहना मुश्किल था। इससे उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती अतः उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा। वह समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे इन प्रकाशित लेखों एवं पुस्तकों से कोई अच्छा शिक्षक साबित हो सकता है? किस तरह एक साल में दो दो पुस्तकें छप रही थी और चार-पांच शोध पत्र लिखे जा रहे थे, यह उन्हें बखूबी मालूम था, पर उन्होंने कभी बहती गंगा में हाथ धोना उचित नहीं समझा। पर अब फैसले की घड़ी आ चुकी थी, उन्हें कुछ तो निर्णय करना था अन्यथा प्रमोशन असंभव था।
इसी तरह दो महीने बीत गए, कहीं कोई राह नहीं सूझ रही थी। कनिष्ठ सहयोगी डॉ कृष्ण सिंह सब समझ कर भी मौन थे यद्यपि डॉक्टर शिवकुमार की सारी समस्या का हल उनके पास था। वह बखूबी जानते थे कि यह एपीआई हेतु “कागज का पेट” किस तरह भरा जा सकता है। बहुत सारे विश्वविद्यालय प्रोफेसरों ने उनके ऐंद्रजालिक ज्ञान का लाभ उठाया था। यहां बात घर की थी, डॉ कृष्ण सिंह कैसे पीछे रह जाते? अगले दिन शाम को वह डॉ शिवकुमार के घर पर थे। चाय और नमकीन के बाद उन्होंने डॉ शिवकुमार से कहा, “अरे सर एपीआई नहीं है तो हो जाएगी, इसमें क्या दिक्कत है?” वह हैरान होकर उनकी बात सुन रहे थे। डॉ कृष्ण सिंह ने उन्हें साम, दाम, दंड, भेद के सारे उपाय बता दिए। उनकी बात सुनकर डॉ शिवकुमार आश्चर्यचकित, उन्हें धीरे-धीरे यह लगने लगा था कि वह भी एक सह-युक्त आचार्य से प्रोफेसर बनने जा रहे हैं जो कि उनके मन लगाकर शिक्षण कार्य से कदापि संभव नहीं था। डॉ कृष्ण सिंह उनके लिए तारणहार के रूप में अवतरित हुए थे जो उन्हें इस प्रमोशन की महाभारत में समूची कौरव सेना के ऊपर विजय दिलाने हेतु प्रयासरत थे। उन्होंने उन्हें गले से लगा लिया।
दो महीने के पश्चात अगली आइक्यूएसी की बैठक में तीनों शिक्षक एपीआई प्रोफार्मा भर कर प्राचार्य के सामने उपस्थित थे। प्राचार्य “कागज के पेट” महामंत्र का महात्मय बखूबी जानते थे अतः उन्होंने मुस्कुरा कर उन तीनों फाइलों पर दस्तखत कर दिए। मिठाईयां बंटने लगीं क्योंकि महाविद्यालय को तीन नए प्रोफेसर मिलने वाले थे। अब इस “कागज का पेट” महामंत्र की प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई थी और इसका वाचन लगभग हर बड़े संस्थान में जोर शोर से हो रहा था। बहरहाल चयन समिति की बैठक प्रारंभ हुई। बैठक में अन्य विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर जिन्होंने खुद “कागज का पेट” भर कर प्रोफेसरशिप प्राप्त की थी वे महाविद्यालय के शिक्षकों की फाइल देखते समय उनके शीघ्रता से दिव्य ज्ञान प्राप्त करने पर आश्चर्यचकित थे। यह भारत की उच्च शिक्षा के इतिहास में एक काला दिन था जिसमें किसी शिक्षक के द्वारा मन लगाकर पठन-पाठन, सच एवं मौलिक लेखन का कोई महत्व नहीं रह गया था। गाड़ियां आ रही थीं, जा रही थीं, लिफाफे से लिफाफे टकरा रहे थे। दूर कहीं नेपथ्य में डॉ शिवकुमार से कुछ-कुछ मिलती-जुलती आवाज में “कृष्णम शरणम गच्छामि”… “कृष्णम शरणम गच्छामि” का उच्चारण प्रतिध्वनित हो रहा था पर वाग्देवी मौन थी, ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने कानून की देवी की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी।
आज डॉ शिवकुमार जरा भी भयभीत नहीं थे। उनके लिए चयन समिति की बैठक न जाने कब एक धर्मयुद्ध में परिणत हो गई थी जिसमें उनके रथ पर डॉ कृष्ण एक कुशल सारथी के रूप में विद्यमान थे। उन्होंने अपने तरकश से अपने के तीर लक्ष्य पर चलाए और सभी तीर निशाने पर लगे। आज उनके रण कौशल को देखकर डॉ विश्वगुरु भी आश्चर्यचकित थे। आसमान से पुष्प वर्षा होने लगी, लोग उनकी जय जयकार करने लगे। इस धर्म युद्ध के साक्षी सभी सदस्य उन्हें बधाई देने में लग गए।
अंततः उनके दिव्य ज्ञान को प्रोफेसर होने का प्रमाण पत्र मिल रहा था, पर केवल शिवकुमार ही जानते थे कि उनके अंदर बहुत कुछ टूट चुका था।