आप सोच रहे होंगे कि मैं जो लिखने जा रहा हूं किसी रिटर्न गिफ्ट के संबंध में है, पर जो मेरा अब तक का अनुभव है उससे तो यही लगता है कि हमें किसी रिटर्न गिफ्ट के मिलने में संशय है। हालांकि मेरा ब्लड ग्रुप बी पॉजिटिव है पर सभी बी पॉजिटिव वाले पॉजिटिव होंगे ही, इसकी कोई गारंटी नहीं। खासकर जब आंखें खुली हों। हां, आंखें बंद हो तो और बात है। अनुभव भी कम नहीं, क्योंकि इस साल अगस्त में मैं अपने जीवन के पचपनवें वर्ष में प्रवेश करने जा रहा हूं। कुछ लोग यह अंतर कर सकते हैं कि मैं अपने बचपन में एक गांव में पला बढा और नए जेनरेशन से मेरी पीढ़ी अलग है, इसलिए मैं उतना आशान्वित नहीं रहता, पर यही तो मैं कहना चाहता हूं जो आप मुझे बता रहे हैं। मेरे कहने का आशय एकदम साफ है जिसके मूल में रिटर्न गिफ्ट का अवसर खो देना है क्योंकि हमने काम ही ऐसे किए हैं। पुराने समय में जो चीजें हमारे पास थी उनकी एक लंबी फेहरिस्त मैं गिना सकता हूं जो अब हमारे पास नहीं, उनमें से बहुत सारी चीजें तो इतनी महत्वपूर्ण है कि वह बिना कुछ समझाए ही हर आदमी समझ सकता है। यह हो सकता है कि कुछ नए लोग मेरी बात न समझे क्योंकि उन्होंने उस पुराने समय को देखा नहीं। विकास की अंधी दौड़ में हम कहां से कहां चले आए और आज हम उन पुरानी चीजों को देखने के लिए लालायित रहते हैं जो अब हमारे पास नहीं, पर “अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत”? बड़े शहरों में बसा मनुष्य अपने अपार्टमेंट की खिड़कियों से और बालकनी से बाहर देख कर कुछ अलग देखने की टकटकी लगाए रहता है जिससे उसके जीवन में कुछ आनंद, ऊर्जा और उत्साह की अनुभूति हो सके। इस नैराश्य के माहौल में वह कब तक अपना टैंपो हाई रखे, समझ में नहीं आता?
मैं स्वीकार करता हूं कि इस नई दुनिया ने हमें बहुत कुछ दिया, सड़के, बिजली, चमचमाती कारें, हवाई जहाज, रोजगार इत्यादि इत्यादि। भूमंडलीकरण के दौर ने हम सब को अंतर्राष्ट्रीय बना दिया है क्योंकि अब ज्यादातर चीजें अंग्रेजी के शब्द “इंटर” से शुरू होती है जैसे इंटरनेशनल, इंटरस्टेट, इंटर डिसीप्लिनरी इत्यादि इत्यादि और उन सबमें सबसे महत्वपूर्ण यह इंटरनेट, जो सारी दुनिया को जोड़ने का माध्यम बना है। पर यहां यह सवाल उठता है कि जब हमें इस नए दौर में इतना कुछ प्राप्त हो गया तो हमसे कुछ छीना किसने? उसका एक ही उत्तर है मित्रों- शहरी जीवन और आर्थिक समृद्धि हेतु हमारी रोज बलवती होती इच्छा ने जिसके कारण हम सुविधाओं, भोग-विलास और स्वार्थ को ही अपने जीवन का मूल समझ बैठे और हमने अपने स्वार्थ के कारण अपनी संवेदना की तिलांजलि दे दी । मुझे कोई संदेह नहीं कि हम आज समाज, जीवन के मूल्यों एवं पारिवारिक खुशियों से बहुत दूर हो चुके हैं जो हमें ऊर्जित करते है। इस कारण आज हर आदमी अपने ही द्वारा बनाए गए कैद खाने में है और वह इंटरनेट की वर्चुअल दुनिया में खो चुका है और उसे ही वास्तविकता मानते हुए बड़े-बड़े असाइनमेंट ले रहा है, पैसे भी कमा रहा है पर जब वह अपने ह्रदय के किसी कोने में झांकता है तो उसे लगता है कि वह नितांत अकेला है। यहां तक कि उसके बच्चे भी उसके पास नहीं और जीवन में किसी बीमारी या अपंगता के आ जाने के बाद उसके साथ कोई होगा भी कि नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं। एल्डर केयर के क्षेत्र में नई नई फ्रेंचाइजी खुलती जा रही है और उनमें एक गजब सा उछाल आ गया है। यह इस बात का सबूत है कि अब हमारे आसपास बंजर भूमि बढ़ती जा रही है जहां मानवीय संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं बची।
गांव से आकर शहर बसने के मूल रूप से चार तर्क थे, सड़क, बिजली, शिक्षा और रोजगार। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह चारों चीजें हमें मिली और हमारा विकास भी हुआ, पर क्या विकास उस तरह हुआ जिस तरह हमारी अपेक्षा थी? शायद नहीं। हम तो अपने साथ अपना सारा गांव उठा कर शहर लाए थे पर बाद में ऐसा लगा कि गांव की चीजें यहां अपना अस्तित्व नहीं बचा पाएंगी और अंततः यही हुआ भी। मुझे लगता है कि उनमें बहुत सारी चीजें हमारी सेफ्टी वाल्व होती थीं क्योंकि गांव में अक्सर संसाधन की कमी होती थी। जब हमारे पास संसाधन बढ़ने लगे तब वह चीजें हम से दूर चली गईं और हमारा जीवन नितांत एकाकी होने लगा। आज हम सब संसाधनों से घिरे हुए हैं और आगंतुकों को अपनी चीजों को बड़े गर्व से दिखाते भी है पर एक दिन ऐसा समय आता है जब आपको यह लगता है कि अब संसाधन हमें खुशी नहीं दे रहे, एक तरह की बोरियत और अलगाव ने हमारे मन में घर बना लिया है जो कभी खत्म नहीं होता। इस शहर ने हमको यही तो दिया है, समय की कमी, सहयोग की कमी, साफ हवा की कमी, संवाद और संवेदना की कमी और अंततः किसी की बात सुनने का सामर्थ्य और धैर्य का न होना। साथ ही साथ नींद की कमी, स्वास्थ्य की कमी और बात बात पर मानसिक संतुलन खो देने जैसा व्यवहार हम अपने आसपास रोज देख रहे हैं। ब्लड प्रेशर, शुगर और इनसोम्निया आजकल की सबसे चर्चित बीमारियां हो गई हैं । बात बात पर झगड़े होते हैं और पारिवारिक ताना-बाना टूटता जा रहा है। हालत तो यह हो चली है कि अब एक दूसरे से अलग रहने के लिए अलग कमरे की भी जरूरत नहीं क्योंकि आप एक कमरे में होते हुए भी मानसिक रूप से अलग रह सकते हैं जब आपके हाथ में कोई यंत्र हो।
हमारी पीढ़ी में पिता या बाबा से ऊंची आवाज में बात करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि हिम्मत ही नहीं होती थी। अक्सर तीन पीढ़ियां एक साथ रहती थीं और कई बार तो जब पिता का डंडा गिरता था तो इस बात की गारंटी होती थी की एक दो डंडा खाने के बाद बाबा वहां आ जाएंगे और मुझे बचा लेंगे। बाबा का पैर दबाते आप लोगों ने भी अपने पिता को देखा होगा और बहुत सारी बहनों ने अपनी मां के पैर भी दबाए होंगे। यह शुद्ध रूप से एक चेक और बैलेंस की व्यवस्था थी पर अब यह व्यवस्था कहीं नहीं है। पिता और बाबा के पास नहीं होने पर यह काम अब इंटरनेट कर रहा है जिसने सभी को समान स्वतंत्रता दे दी है, सामाजिक ढांचे को तहस-नहस कर दिया है और जो पारिवारिक व्यवस्था होती थी उसे करीब-करीब मिटा डाला है। जेनरेशंस के बीच वर्चुअल दीवारें खड़ी कर दी गईं हैं क्योंकि आजकल प्राइवेसी एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिस पर संग्राम चल रहा है। अब बच्चे पिता के कंधे पर सवारी नहीं करते, प्राम पर चलते हैं, उनके लिए अलग-अलग कमरे बना दिए गए हैं क्योंकि कमरों का अलग होना समृद्धि की निशानी है। आखिर कमरे अलग होंगे तभी तो पाश्चात्य संस्कृति और इंटरनेट पूरी स्वतंत्रता से उनकी बुद्धि को नियंत्रित कर पाएगा । कभी-कभी मुझे लगता है कि हमने अपने नौनिहालों को खुद ही व्याघ्र को सौंप दिया जिस कारण वह हमारी आंखों के सामने लीले जा रहा है और हम असहाय होकर उन्हें देख रहे हैं।
सुन रहा हूं कि अब लोगों ने प्रेम विवाह करना शुरू कर दिया है पर उसके साथ ही वैवाहिक विच्छेदनों की संख्या बढ़ गई है। यह कौन सा प्रेम है जिसमें प्रेमिका अपनी पहली शर्त यह रखती है कि मैं अपने सास-ससुर को अपने साथ नहीं रखूंगी? पुराने जमाने में तो ऐसा नहीं सुना, कहीं आपने सुना हो तो बताइएगा। निश्चित रूप से यह एक लिमिटेड एडिशन का प्रेम है जो आजकल की प्रेमिकाएं कर रही हैं जिसमें सास ससुर के उनके पास आते ही उनके प्रेम का मीटर बड़ी तेजी से नीचे भागता है, भले ही पति उसे ऊपर रखने के लिए लाख मान मनव्वल करता रहे। और बनाइए अपने आपको इंटरनेशनल, भाई इंटरनेशनल तो यही होता है ना कि बच्चे बड़े हो जाने के बाद मां बाप के पास नहीं रहते और कभी कभार उनसे वार्षिक मुलाकात कर लेते हैं। भाई, सास-ससुर साथ साथ रहेंगे तो यह हंसों का जोड़ा कैसे हर दिन पास के रेस्तरां में डिनर कर पाएगा या छोटे कपड़ों में समुद्री किनारों पर स्नान कर पाएगा? इसलिए रुझान आपके सामने है, नोएडा में एक वृद्धा का शव अपने बिस्तर पर छ: महीने तक पढ़ा रहा और उसके पुत्र ने उसकी सुध नहीं ली, दिल्ली में दो लड़कियां अपने फ्लैट में पड़े पड़े भोजन के बिना जीवाश्म बन गई कि रोजगार के बिना वह उधार किससे मांगे, इस तरह के बहुत सारे उदाहरण आपने अपने आसपास सुन रखे होंगे, ज्यादा विस्तार से कहने की आवश्यकता नहीं है। क्या आपने अपने गांव में ऐसा कभी सुना था, भाई मैंने तो नहीं सुना। हां, यह जरूर है कि मेरे गांव में उस समय सड़क और बिजली नहीं होती थी और वहां के लोग बहुत ज्यादा पढ़े लिखे भी नहीं होते थे। पुराने दिनों की बात करते हुए आदमी को लोग विलेज मेंटालिटी या मिडिल क्लास मेंटालिटी का कहते हैं। उनके हिसाब से मिडिल क्लास मेंटालिटी का आदमी वह है जो अभी उतना विकसित नहीं हुआ है। मेरे विचार से उनका आकलन एकदम सही है कि विलेज मेंटालिटी का आदमी अभी उतना विकसित नहीं हुआ है कि अपने पिता माता को एल्डर केयर या अनाथालय में छोड़कर चला आए और ना इतना संवेदनहीन हुआ है कि अपने पड़ोसी का हाल-चाल भी न पूछे और उसे दो वक्त खाना न खिला सके। बच्चे आजकल जोर से डांट देने पर या मोबाइल छीन लेने पर खुदकुशी कर ले रहे हैं, गौर करने की बात यह है कि यह संपन्न घर के बच्चे हैं, किसी गरीब घर के नहीं। गरीब घर के बच्चे होते तो जैसे तैसे कुछ जुगाड़ कर ही लेते हैं। आप ही निष्कर्ष निकाल लीजिए कि संपन्न हो जाने के बाद क्या आदमी मानसिक तौर पर इतना कमजोर हो जाता है।
मेरे विचार से हर मनुष्य के लिए कमी का एहसास बहुत जरूरी है जो गांव के लोगों में होता था। यह एक ऐसा मूल मंत्र था जो उनके व्यवहार और आचरण को संयमित रखता था। आजकल संसाधनों के अतिरेक के कारण पिता माता अपने बच्चों में कमी का एहसास होने नहीं देना चाहते क्योंकि इससे शायद उनकी प्रतिष्ठा घट जाएगी और वह समृद्ध नहीं कहला पाएंगे। मां बाप अपनी झूठी प्रतिष्ठा के चक्कर में बैंकों से लोन लेकर अपने बच्चों को वह सब दे रहे हैं जो वह मांगते है पर रिटर्न गिफ्ट क्या मिलेगा, यह तो उनके वृद्ध होने के बाद ही पता चलेगा। हमारी हालत डब्लू बी इट्स की कविता ‘द सेकंड कमिंग’ के उस मदारी की तरह हो गई है जिसमें उसके ही द्वारा प्रशिक्षित किए गए पक्षी पर अब उसका कोई नियंत्रण नहीं।