वेलकम टू पाटलिपुत्र

चलिए आज आपको कुछ पुराने दिनों से परिचित कराता हूं। पाटलिपुत्र से तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं अपने प्रिय राज्य की बात कर रहा हूं क्योंकि यह नाम वहीं से संबंधित है, हां विरोधी पार्टी वाले कभी-कभी इसका नाम जंगलराज से जोड़ देते हैं, यह और बात है। जंगल में मंगल करना कोई हमसे सीखे, और इसके कुछ उदाहरण भी मैं आपको देता हूं। उस दिन मैं अपने गांव से बनारस जाने के लिए निकला था। गांव से थोड़ी दूर एक अन्य कस्बे से बस मिलती थी? थोड़ी देर इंतजार करने पर बस आ गई जो खचाखच भरी हुई थी। अंदर घुसने की रत्ती भर भी जगह नहीं थी। खलासी स्वयं दरवाजे से लटका हुआ था और हमें ऊपर चढ़ने के लिए इशारा कर रहा था।

“ए बालकनी में जा, बालकनी में, ऊपर हवा खात जईह।”

तो यह थी बस यात्रा की शुरुआत। जैसे तैसे में ऊपर चढ़ा और पालथी मारकर बैठ गया, बस छोड़ता भी कैसे क्योंकि अगली बस न जाने कब आती? बालकनी से आप यह मत समझ लीजिएगा कि मैं कोई सिनेमा हॉल की बात कर रहा हूं। हमारे यहां बस की छत को भी बालकनी कहा जाता था।

खैर बस चली और सामने से तेज हवा के झोंके मुझसे टकराने लगे, आनंद आने लगा, पर गाहे-बगाहे सामने से पेड़ों की लटकी हुई डालियां भी हमारा वेलकम कर रही थी जैसे हमारी फिटनेस की परीक्षा ले रही हों। डालियों के पास आते ही हम सब अपना सिर नीचे झुका लेते और डालियां ऊपर से गुजर जाती, है ना आनंद की बात? हम सब जैसे हाथी पर बैठे हुए थे और बस रूपी हाथी हिचकोले खाता हुआ तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था क्योंकि सड़कें तो थीं ही नहीं, हां, सड़कों में गड्ढे अवश्य थे, पर हमारे यहां के ड्राइवरों की कला का तो कोई सानी ही नहीं, वह उन गड्ढों में से बसों को ऐसे निकालते जैसी उन्हें उन गड्ढों से इश्क हो चला था।

उन दिनों हमारे यहां एक स्वनामधन्य यदुवंशी राजा का शासन था। इत्तेफाक से वह मेरे जिले के ही थे। वह चुनावी सभाओं में “अगड़े” को सबक सिखाने की बात उसी तरह करते जैसे एक बड़े नेता आजकल विरोधियों को मिट्टी में मिलाने की चेतावनी देने लगे हैं। इसका अर्थ तो मैं अब तक नहीं समझा पर उस समय यह चर्चा लाइमलाइट में थी। वह जहां भी जाते, मंचों से अपने दृढ़ निश्चय को जरूर दोहराते जैसे गीता का पाठ कर रहे हों और सामने उनकी प्रजा अर्जुन की भांति उनसे ज्ञान लेने को उत्सुक हो। इस कारण उनकी जनसभाओं में अपार भीड़ होती और वह अपने हास्य विनोदी तर्कों से मजमा लूट लेते। एक जगह किसी ने उनसे सड़क की खराब स्थिति पर प्रश्न पूछा, “साहब, सड़क बड़ा खराब हो गईल बा, चलत में लोग गिर जाता, घुटना फूट जाता आ लइकन के अईला गईला में भी बहुते दिक्कत बा।” उन्होंने जवाब दिया, “का होई तोरा सड़क रे, सड़क पर त बड़ लोग के गाड़ी चलेला, लोग आई अ तोरा के कचार दी, बक बुड़बक।” आप समझ ही गए होंगे कि मैं किस दुनिया की बात कर रहा हूं। यही सज्जन थे जिन्होंने कभी हमारे यहां की सड़कों को किसी प्रसिद्ध अभिनेत्री के गाल की तरह बनाने की बात कही थी। एक जगह तो उन्होंने हद ही कर दी, एक मंच पर उन्होंने वहां के जिलाधिकारी को इंगित करते हुए ऐसी बातें बोली कि जिलाधिकारी को वहां बैठे-बैठे शर्म आने लगी, पर वह करता भी क्या, प्रोटोकॉल का तो पालन करना ही था। उन्होंने पूरे जनसमूह से कहा कि जब वह रास्ते में आ रहे थे तो एक जगह गन्ने की फसल लहलहा रही थी। उन्होंने जिलाधिकारी को ही गन्ना तोड़कर लाने के लिए कहा था, अब यहां पता नहीं कि जिलाधिकारी स्वयं गन्ना तोड़ने गए थे या उनका मातहत, पर मंच से यही ऐलान हो रहा था कि जिलाधिकारी महोदय ने गन्ना लाकर हमारे नेता जी को दिया था और उन्हें वह गन्ना बहुत अच्छा लगा था। कभी कभी वह अधिकारियों से खैनी (तंबाकू) बनाने के लिए भी कह देते और उन्हें उनके प्रोटोकॉल का पालन करना पड़ता। भैंस पर आगे की ओर से चढ़ने की कहानी तो आपने सुनी ही होगी, कुल मिलाकर अधिकारियों, शिक्षकों एवं प्रोफेसरों की बहुत प्रतिष्ठा नहीं रह गई थी क्योंकि हर राजनीतिक मंच पर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती। बहुत से लोगों के लिए यह लोकतंत्र की विजय थी, सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत थी जिसका परीक्षण स्थल मेरा प्रदेश पाटलिपुत्र हो गया था। हां, यह बात और थी कि बहुत से व्यवसाई, डॉक्टर एवं इंजीनियर परिवारों ने बगल के प्रदेश में परिवार रखना, बच्चों को पढ़ाना और घर बनाना शुरू कर दिया था क्योंकि वह अपने भविष्य के प्रति बहुत ही सशंकित हो चले थे। अपहरण जैसा व्यवसाय भी अब राज्य में अपना जीएसटी वसूलने में लगा था। लोग अब रात की बजाय केवल दिन में ही बाहर निकलने लगे थे क्योंकि रात को उन्हें अच्छी नींद आने लगी थी। इसी प्रकार हमारे यहां चल रहे सभी रोजगार बंद हो गए और जो आने वाले थे वह आए ही नहीं। उजालों की जगह अंधेरों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। पूर्व में हमारे यहां के लेखकों और कवियों की ख्याति हर जगह उनसे पहले वहां पहुंच जाती, पर अब हम ही हर जगह थे, मजदूरी में, ईट भट्ठों में और रिक्शे वालों में, और न जाने अन्य कितने रोजगारों में भी। यह कहिए कि हममें जीने और जूझने का जज्बा पहले से मौजूद था, इसलिए आज हम दुनिया के हर शहर में हैं और कोई भी चीज हमारे बिना संभव नहीं हो पाती। यदुवंशी राजा इस प्रदेश के शासक करीब पंद्रह साल तक रहे और पंद्रह साल के बाद जब वह हटे तो सामाजिक न्याय पूरा हो चुका था और लोकतंत्र की विजय भी हो चुकी थी जब उन्होंने अपनी पत्नी को बीच में ही राज्य की महारानी बना दिया था। बाद में यह स्वनामधन्य नेता देश के रेल मंत्री भी बने और बहुत से बड़े दलों के प्रिय भी रहे। यहां यह कहना आवश्यक है कि यह महानुभाव बाद में अपने द्वारा उद्घाटन किए हुए कारागार में समय बिताने को प्रेरित हो गए। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के कारागार में जन्म लेने की बात सुनी थी इसलिए वह कारागार को ही मोक्ष प्राप्त करने का प्रस्थान बिंदु मानने लगे होंगे।

अरे हां, एक और कहानी अभी आपको सुनानी बाकी है। मेरे छात्रावास के कर्मचारी आवास में रह रहे लैब टेक्नीशियन श्री उमेश झा की। वह मधुबनी जिले से थे। कभी-कभी उनके साथ मेरी कुछ बातचीत हो जाती थी। एक दिन वह चाय के समय वह अपने विवाह का किस्सा सुनाने लगे, उनकी पत्नी भी वहीं बैठी थीं, कि कैसे उनके ससुर ने उनके साथ बहुत बड़ा धोखा किया था। मैं घूम कर उनकी पत्नी के चेहरे को देख रहा था कि कहीं वह नाराज ना हो जाएं, पर वह तो मुस्कुरा रहीं थीं । मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। बाद में झा जी ने बताया कि उनका विवाह अपहरण कर हुआ था। यह सुनकर मैं चौक गया, बात ही ऐसी थी। उस समय उमेश झा दरभंगा के किसी महाविद्यालय के छात्र थे, वह विवाह योग्य हो चुके थे और उनके ससुर इनके यहां शादी के लिए एक दो बार आ चुके थे। इनके पिता कहीं और इनका विवाह करने का सोच रहे थे। एक दिन उमेश झा महाविद्यालय से आते समय उठा लिए गए और उन्हें उनकी ससुराल में पहुंचा दिया गया जहां विवाह की सारी तैयारियां हो चुकी जाएं थीं। उन्हें वहां कैद कर उनके पिता माता को सूचना दे दी गई की विवाह अगले ही दिन है। उनके पिता को तो सदमा लग गया, अंततः वे अगले दिन अपने गांव के दस लोगों को लेकर विवाह के समय इनके ससुराल पहुंच गए। उन्होंने देखा कि गांव के बाहर बंदूक लेकर चार जन बारात का इंतजार कर रहे थे और उन्हें देख कर मुस्कुरा रहे थे। विवाह संपन्न हुआ और अगले दिन इनके पिता बारात लेकर अपने घर लौट गए। दस दिन बाद उमेश झा की विदाई ससुराल से उनकी पत्नी के साथ हुई। दूल्हा उठाने वाली पार्टी ने अपना काम संपन्न कर दिया था और एक निश्चित रकम लेकर किसी और दूल्हे को उठाने में व्यस्त हो चुकी थी। इत्तेफाक से उमेश झा की पत्नी सुंदर थीं इसलिए उन्हें उठाई गिरोह से कोई शिकायत नहीं थी, पर कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

बाद में उमेश झा काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आयुर्विज्ञान संस्थान में लैब असिस्टेंट के पद पर नियुक्त हो गए और बनारस में ही पत्नी के साथ रहने लगे । कुछ वर्षों के बाद उनके साले ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वह भी विवाह योग्य हो ही चुका था। न जाने क्यों उसे देखकर उमेश झा बहुत प्रसन्न थे । उनकी पत्नी उनकी खुशी का कारण समझ नहीं पा रही थीं । वह अपने साले का अच्छे से ख्याल करते और साथ-साथ इधर-उधर जहां जरूरत पड़ती उसे ले जाते। उमेश झा को अभी भी अपने पिता का मुरझाया चेहरा याद आ रहा था जब वह उनकी ससुराल से विवाह के उपरांत विदा हो रहे थे। तभी गर्मी की छुट्टियां आने वाली थीं और उमेश झा सपरिवार मधुबनी जाने के लिए अपना आरक्षण करा चुके थे। मधुबनी स्टेशन पर उतरने के बाद वह बाहर निकले। कोई मारुति वैन बाहर उनके साले का इंतजार कर रही थी और वह उठाई गिरोह अगले ही क्षण उनके साले को लेकर चंपत हो गया। कुछ दिनों के बाद जब उनका साला विवाहित होकर उनके ससुराल पहुंचा, उमेश झा हौले हौले से मुस्कुरा रहे थे, न जाने क्यों इस बहूभात की पूड़ी उन्हें बहुत स्वादिष्ट लग रही थी। यह कहानी सुनकर मैं जान गया था कि मेरा सहपाठी विनीत छुट्टियों में अपने घर बेगूसराय क्यों नहीं जाता था, उसके बदले वह कभी नानी के यहां चला जाता और कभी अपनी बहन के यहां , पर कभी अपने सहपाठियों को अपने गांव जाने की सूचना भूल कर भी नहीं देता। तो यह था मेरे पाटलिपुत्र का एक अलग रूप जिसकी अन्य प्रदेशों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते। मैं चुनौती देता हूं कि किसी भी अन्य प्रदेश में किसी का विवाह इस विवाह व्यवसाय की उन्नत तकनीकी से नहीं हुआ होगा। चाणक्य, चंद्रगुप्त, अशोक और बिंबिसार से होता हुआ पाटलिपुत्र उस समय कहां जा पंहुचा था, यह इन छोटी कहानियों से आप अच्छी तरह जान सकते हैं। जातिवाद और अगड़े पिछड़े की राजनीतिक लड़ाई ने हमारे पाटलिपुत्र की क्या हालत कर दी है, और अब तो जातियों के नंबर भी अलॉट होने लगे हैं क्योंकि “जाति नाहीं छूटे रामा, चाहे जिया जाए।” अन्य प्रदेश वाले मित्र सावधान हो जाएं, कहीं उनकी यही हालत कोई अन्य राजनीति न कर दे, क्योंकि:

हम उजड़े तो क्या उजड़े

जो तुम उजड़े तो दुख होगा।

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By Vachaspati Vatsal

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Prof. Vachaspati Dwivedi teaches English in Sant Vinoba P.G. College, Deoria, U.P. India. He is a PhD from India's reknowned University BHU, Varanasi with a first class Post-graduate degree. His foreign tenures took him to teach in Haramaya University, Ethiopia and Al Fateh University Tripoli, Libya. He has 8 books to his credit and more than 30 papers published in different journals, both national and international. In 2012 he presented a paper on Folk Literature in Bangkok International Conference , Thailand and in Feb 2019 he went to Singapore to present a paper on Hijra Autobiographies. He edits an international online journal 'Critical Paradigm' which can be accessed at www.criticalparadigmjournal.com.
He is an acclaimed poet of Hindi as well and has published three poetry collections namely 'Ret ke Sahar Me', 'Phir Khilenge Fool Priytam' and 'Jindagi Jo Shayari Hoti'. Recently his story collection 'Apna Apna Moksh' (2024) has been published worldwide and is available on Amazon and Flipkart.