राजा विक्रमादित्य के देहावसान के बाद सदियां बीत चुकी थीं पर भारत में उनके द्वारा स्थापित की गई राज्य व्यवस्था अभी भी वैसे ही चल रही थी । उनके सिंहासन की बत्तीस पुतलियां अभी भी सिंहासन में जड़ी हुई थीं और उनके लिए राजा की परीक्षा लेना रूटीन कार्य हो चुका था। राजा आते, जाते, फिर नए आते, सदियों से यही चल रहा था। उनके मन मस्तिष्क में धीरे धीरे एक उदासी ने घर बना लिया था। हां, नए राजा के आने के पश्चात दो-तीन दिन कुतूहल और जिज्ञासा अवश्य रहती पर धीरे-धीरे सब शांत हो जाता और फिर वैसे ही चलने लगता। किसी नए राजा को वहां बैठने की अनुमति देने की पूर्व वे उससे कुछ सवाल करतीं और सवालों के आधार पर नए शासक को वहां बैठने दिया जाता। शुरुआत के वर्षों में राजा विक्रमादित्य के जाने के बाद उन्होंने तीन चार शासकों को उन्होंने सिंहासन पर बैठने से मना भी कर दिया था पर अब उनके बहुत सारे सवाल पुराने हो चुके थे जो पहले से नए राजाओं को पता होते और वह वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की तरह उनकी तैयारी करके आते। स्थिति तो यह हो गई थी कि अब पुतलियों को नए सवाल भी नहीं मिलते। बड़ी समस्या हो रही थी लेकिन अब वह करें तो क्या करें? ईश्वर ने उन्हें उसी सिंहासन में कैद जो कर दिया था। इस कार्य से मुक्ति पाने की इच्छा तो होती जब वह देखतीं की राजा सिंहासन पर बैठने के बाद अपनी मनमानी शुरू कर देता है, यहां तक कि प्रजा की इच्छा की अवहेलना भी। लेकिन परीक्षा में पास होने का प्रमाण पत्र देने के बाद पुतलियों के हाथ में कुछ नहीं रहता क्योंकि राजा उस प्रमाण पत्र को अपने कार्यालय में सोने के फ्रेम में रखता कि कोई पत्रकार यह न पूछ बैठे कि आपसे पुतलियों ने प्रश्न पूछा भी था या नहीं?
अन्य देशों के पत्रकार भी इस तरह के प्रकरण में निरुत्तर हो जाते क्योंकि भारत में राजा से सिर्फ पुतलियों के द्वारा प्रश्न पूछे जाने का नियम था। कोई और पूछ ही नहीं सकता था क्योंकि यह भारत की शासन प्रणाली थी, फ्रांस का लोकतंत्र तो था नहीं कि आप जब चाहे सवाल पूछने लगे और राजा को पदच्युत कर दें। तभी अचानक पुतलियों को सूचना मिली कि नए राजा दरिद्रनारायण जी अब सिंहासन पर बैठने हेतु परीक्षा देने आ रहे हैं जो पुराने राजाओं से बिल्कुल अलग है और उन्होंने इसके पूर्व एक छोटे राज्य को स्वर्ग बना दिया है। यह सुनकर अपार हर्ष से उनका दिल भर आया।
जैसे जैसे सूचना मिल रही थी वे सभी नए राजा दरिद्रनारायण के कारनामों से परिचित होती जा रही थीं । कुछ पुतलियों ने तो आनंद में कुछ खुशी के गीत भी गुनगुनाने शुरू कर दिए। चारों ओर हर्ष का माहौल था, लड्डू और बर्फी बांटी जा रही थी, कालीन और पर्दे बदले जा रहे थे। उन्होंने यह भी सुना था नए राजा के पास कोई जादू की छड़ी है, वह छड़ी घुमाते हैं और सारा परिदृश्य एक विकसित प्रदेश में बदल जाता है। यानी अब दरबार में नए-नए दृश्य उपस्थित होने वाले थे और पुतलियां भी उनका दर्शक बनने वाली थीं । उन्हें लग रहा था कि अब उन्हें बोरियत कभी नहीं होगी और वह पूरी स्वतंत्रता से राजा दरिद्रनारायण से सवाल कर पाएंगी। इससे पूर्व के दो-चार राजा बड़े ही कुटिल और चालाक साबित हो चुके थे और उनसे प्रश्न पूछते पूछते सभी पुतलियों को अच्छा खासा अनुभव भी हो चला था। पर वे फिर से राजा विक्रमादित्य जैसा राजा नहीं चाहती थी, क्योंकि राजा विक्रमादित्य विद्वान थे, उनके सामने उनकी एक नहीं चलती थी और कभी-कभी तो गलत प्रश्न उठाए जाने पर वह पुतलियों को डांट भी देते थे।
पुतलियों को राजकोष से नए वस्त्र दिए जा रहे थे और वह भी जोर शोर से इस समारोह की तैयारी में लगी हुई थीं । वह सोच रही थी, अब मजा आएगा, राजा दरिद्रनारायण बड़े सरल है, अब वे शासक के बहुत करीब होंगी और एक तरह से यह उनका ही शासन होगा। उन्होंने यह भी सुन रखा था कि राजा दरिद्रनारायण अपने पूर्व के राज्य में “दिल की बात” सीरियल की शूटिंग एक फिल्मी अंदाज में हर महीने किया करते हैं और यह सीरियल अब तक कितने ही फिल्म फेयर अवार्ड जीत चुका है जिससे उसकी चर्चा पूरे विश्व में फैल चुकी थी। कितनी एकाग्रता से उनके भक्त इस सीरियल को देखते थे यह अपने आप में एक नया उदाहरण था और यह उनके बहुत बड़े फैन फॉलोइंग को साबित कर रहा था। यहां तक कि हमारे पड़ोसी देश के राष्ट्रपति भी अब ऐसा ही कुछ कार्यक्रम करने का सोचने लगे थे।
अपने नए राजा का नाम दरिद्रनारायण भी उन्हें बड़ा सुकून दे रहा था क्योंकि वह गरीबों के मसीहा के रूप में अवतरित हुए थे। अब तक तो ऐसे नाम के राजा कभी हुए ही नहीं थे। महाराज विक्रमादित्य के बाद ज्योतिरादित्य, फिर आदित्यादित्य, फिर मधुरादित्य और अनगिनत बार ऐसे ही बड़े-बड़े नाम शासकों के रहे थे, इसलिए यह नाम दरिद्रनारायण बड़ा ही रोचक जान पड़ता था । कभी-कभी उन्हें भ्रम होने लगता कि कहीं राजा दरिद्रनारायण इमरजेंसी आंदोलन के नेता जयप्रकाश नारायण के खानदान से जुड़े तो नहीं है पर विश्वस्त सूत्रों ने इस चीज को पूरी तरह खारिज कर दिया था ।
राजमहल में नई तकनीकी के सारे साधन लगाए जा रहे थे, कैमरे, टेलीप्रॉन्पटर, एलसीडी टीवी, लैपटॉप इत्यादि। अब पुतलियों को लैपटॉप भी मिलने वाले थे ताकि वे प्रश्नों को सही ढंग से सहेज कर पूछ सकें, ईमेल भेज सकें और अन्य देशों की पुतलियों से भी संवाद कर सकें। हर तरफ जिज्ञासा और उमंग का जादू नृत्य कर रहा था क्योंकि डिजिटल गवर्नेंस का नया मॉडल राजा दरिद्र नारायण अपने साथ लेकर आ रहे थे। तभी राज्याभिषेक आयोजन समिति के सचिव उनसे मिलने आए और उन्होंने सबको बैठक का आमंत्रण दिया। यह भी अपने आप में एक नई चीज थी, पुतलियों को लगा कि वह बैठक के द्वारा नए राजा के बारे में जानकारी एकत्रित कर सकती हैं। बैठक प्रारंभ हुई, हर पुतली के सामने बिसलेरी की बोतल और बोरोसिल का गिलास बड़े करीने से रखा था। गणेश मिष्ठान की काजू बर्फी और नवरत्न नमकीन भी जगह-जगह बड़े ही करीने से चांदी के बर्तनों में रखी थी। सभी पुतलियों का स्वागत भी द्वार पर फूलों से हुआ। तभी आयोजन समिति के सचिव ने बोलना शुरू किया, “देखिए, महामहिम राजा दरिद्रनारायण के निर्देशों के अनुसार मैं आप लोगों से मिलने आया हूं । उनके राज्याभिषेक में कोई त्रुटि न हो इसलिए आप लोगों को इस संबंध में पूर्व में ही प्रशिक्षित करना बहुत आवश्यक है। राज्याभिषेक के पूर्व महाराज कोई भी त्रुटि नहीं चाहते। वह आपके प्रश्न पूछने का अधिकार का पूरा सम्मान करते हैं परंतु अभी तक आप लोग राज्याभिषेक के पहले प्रश्न पूछती रही हैं, अगर इस प्रश्न पूछने की परंपरा को राज्याभिषेक के बाद कर लिया जाए तो क्या अच्छा नहीं होगा?”
पुतलियों के बीच हलचल बढ़ गई थी, वह सोचने लगी कि यह तो गलत होगा क्योंकि अब तक तो पुरानी मान्यताओं के अनुसार पुतलियां ही राजा कि उनके अभिषेक के पूर्व परीक्षा लेती रही हैं, और पुतलियों पर ही प्रजा का पूरा विश्वास रहा है कि वह सही राजा का चयन करके उसे सिंहासन प्रदान करें। यह तो उनका पुराना अधिकार है, इसे कैसे कोई खत्म कर सकता है? सभी ने एक स्वर में इस प्रस्ताव को नकार दिया।
सचिव ने आगे बात बढ़ाई, “देखिए राज्याभिषेक पहले हो जाने का मतलब यह नहीं है आपके किसी अधिकार का हनन किया जा रहा है, अधिकार तो आपका ही है परंतु इस बार चुंकी राजा दरिद्र नारायण सिंहासन पर बैठने जा रहे हैं उन्होंने देश-विदेश से कितने अतिथियों को इस कार्यक्रम में बुला रखा है। राजमहल में अतिथियों के वहां उपस्थित रहने पर आपका उनसे प्रश्न पूछना अच्छा नहीं लगता इसलिए मेरा आपसे फिर आग्रह है कि अपने राष्ट्र के गौरव को देखते हुए और अपनी प्रतिष्ठा को भी ध्यान में रखते हुए आप इस शर्त को थोड़ा शिथिल कर दें, हां राज्याभिषेक हो जाने के अगले दिन आप जितने चाहे प्रश्न पूछ ले जिससे आपकी हर शिकायत दूर हो जाए। कोई चीज जनता से छुपाई नहीं जाएगी, और अगर आपको लगता है कि राजा दरिद्र नारायण सिंहासन के लायक नहीं है तो आप उनको आसानी से पदच्युत कर सकती हैं, यह तो बहुत आसान है।”
पुतलियों ने अभी कुछ कहने का प्रयास किया ही था कि उन सभी को फूल मालाओं से लाद दिया गया। तालियां बज उठीं और उनका गुणगान जोर शोर से होने लगा था। पुतलियां आखिर थीं तो स्त्रियां ही, आधे से अधिक पुतलियां मालाओं की सुगंध में और उन्हें प्रदान किए गए स्मृति चिन्हों में मग्न हो चुकी थीं । ना करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था, क्योंकि यह सब उन्हें एक स्वप्न की तरह लग रहा था और पहली बार हो रहा था। राजा विक्रमादित्य ने तो कभी उनके महत्व को समझा ही नहीं था और उन्हें ऐसा सम्मान कभी भी नहीं मिला था।
अगले दिन की शुरुआत गाजे-बाजे के साथ हुई। राजा दरिद्र नारायण के साथ उनका सारा मंत्रिमंडल हाथी घोड़ों की कतारों के बीच राजमहल आ रहा था। राजमहल की सजावट इतनी सुंदर थी कि उसे शब्दों में बयान नहीं किया सकता। राजा राजमहल के द्वार पर पहुंचकर साष्टांग दंडवत करते हुए लेट गए। चारों ओर से पुष्प वर्षा होने लगी, उनका जय-जयकार होने लगा क्योंकि यह दंडवत प्रणाम भी राजमहल के द्वार पर पहली बार किसी राजा के द्वारा किया जा रहा था। पुतलियों को लगा यह प्रणाम उनके लिए है क्योंकि इसी राजमहल में तो उनकी आत्मा बसती थी। उन्होंने भी राजा दरिद्र नारायण को निराश नहीं किया, सभी पुतलियों ने बारी बारी से उन्हें फूल मालाओं से लादकर अनुग्रहित किया। अगले ही क्षण मंत्रोचार के बीच राजा के अभिषेक की प्रक्रिया शुरू हो गई। इस कार्यक्रम की छटा देखते ही बनती थी और विश्व के सभी देशों में चौबीस घंटे लाइव प्रसारण जारी था।
अगली सुबह उन्हें लैपटॉप, ईमेल और आधार कार्ड प्रदान कर दिए गए। उन्हें लग रहा था कि वह निर्जीवता से सजीवता की ओर जा रही हैं, क्योंकि अब तो उनका लाइफ-इंश्योरेंस भी किया जा रहा था। उन्होंने राजा दरिद्र नारायण को झुक कर प्रणाम किया और अपने प्रश्नों की तैयारी में लग गई। उन्हें चारों ओर से जीवंत होने की लिए बधाई संदेश मिलने शुरू हो गए और सभी पुतलियां एक दूसरे को धन्यवाद देने में जी जान से लग चुकी थीं । कुछ को ईमेल भेजना और व्हाट्सएप पर मैसेज भेजना नहीं आ रहा था जिसके लिए राजा दरिद्र नारायण के पीए ने ट्रेनर्स की व्यवस्था कर दी थी। वे टाइपिंग भी सीख रही थीं क्योंकि उन्हें अब डिजिटल फॉर्मेट में प्रश्न पूछने थे। दो-चार दिन में उन्होंने काफी कुछ सीख लिया और प्रश्नों की लंबी फेहरिस्त तैयार कर ली। साथ ही साथ उन्होंने फेसबुक पर कितने मित्र बना लिए थे, इंस्टाग्राम पर अकाउंट और ट्विटर पर भी वह एक्टिव हो चुकी थीं । रिलायंस जिओ का नेटवर्क उन्हें वीडियो कॉल भी करने दे रहा था और वह अन्य देशों की पुतलियों से वार्तालाप में मगन हो चुकी थीं । यह अपने आप में एक नया अनूठा अनुभव था। यह सब उनके प्रतापी राजा दरिद्रनारायण की जादू की छड़ी का कमाल था। खैर प्रश्न पूछने का दिन निश्चित हो गया था और इस पूरे कार्यक्रम की लाइव प्रसारण की तैयारियां कर ली गई।
अगले दिन सुबह ही उन्हें आइडेंटिटी कार्ड प्रदान कर दिए गए जिन पर उनका एक सुंदर चित्र चस्पा था। वे आत्ममुग्ध होकर अपने चित्र को निहार रही थीं । उन्हें अनुमान कि नहीं था कि वह इस देश में इतनी महत्वपूर्ण हो चली है क्योंकि उनके चित्र के नीचे बोल्ड अक्षरों में लिखा था “मार्गदर्शक मंडल के सम्मानित सदस्य”। वह अभी उसको पढ़ कर समझ ही रही थीं की सिक्योरिटी गार्ड्स उनके अगल-बगल खड़े हो गए और उन्हें दर्शक दीर्घा में पीछे एक ऐसी जगह ले जाने लगे जहां से प्रश्न पूछना संभव ही नहीं था। सामने बड़ी सी एलसीडी स्क्रीन लगी थी और उस पर सबटाइटल्स चल रहे थे, “सबका मधुमास, सबका मधुमास, सबका मधुमास” और उनके ही हस्ताक्षर से युक्त प्रमाण पत्र हर पोस्टर बैनर पर प्रदर्शित किया जा रहा था। तभी उन्होंने देखा कि सुंदर-सुंदर वस्त्रों में कुछ दूसरी पुतलियों ने प्रश्न पूछना शुरू कर दिया, कार्यक्रम लाइव हो चुका था। वे पुतलियां इन पुतलियों से कहीं अधिक सुंदर थीं और उनके होठों पर लाल रंग की लिपस्टिक दूर से ही आकर्षित कर रही थी। वह कुछ इस तरह सजी-धजी थीं जैसे स्वर्ग से अप्सराएं उतर आई हों। वह मेनका और उर्वशी की तरह मधुर मुस्कान लिए बारी बारी से राजा दरिद्रनारायण से प्रश्न पूछती जा रही थी। राजा दरिद्र नारायण के चेहरे पर मुस्कान खिलने लगी थी क्योंकि उनके द्वारा पूछे गए प्रश्न उन्हें फूलों की भांति लग रहे थे।
विक्रमादित्य की पुतलियां विवेक शून्य होकर यह दृश्य देख रही थीं क्योंकि यह भी राजा विक्रमादित्य के देश में पहली बार हो रहा था।