मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा
मैं झूठा यश न कमाऊंगा
जो देख रहा हूं आंखों से
कविता में लिखता जाऊंगा
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा।
लेखन ही सत्कर्म मेरा
दर्पण बनना है धर्म मेरा
भले कोई मुझसे विलग रहे
निर्बल का साथ निभाऊंगा
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा।
अपनी कोई अभिलाष नहीं
है मन में कोई त्रास नहीं
एक देह मिली, एक देश मिला
जिसकी पीड़ा मैं गाऊंगा
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा।
किस तरह छोड़ दूं अपनों को
शोषण के अंधियारे में
मैं उनको देकर अभयदान
जनकवि ही कहलाऊंगा
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा।
माना सत्ता है बुला रही
बांहे खोले स्वर्णासन पर
मैं लघुता नहीं कमाऊंगा
दिनकर को क्या बतलाऊंगा?
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा।
जो होगा देखा जायेगा
प्रारब्ध? लेश चिंता न मुझे
मैं कैद नहीं रह पाऊंगा
लेखन का धर्म निभाऊंगा
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा।
समृद्ध बहुत कुटिया मेरी
जहां शब्दब्रह्म है कल्पवृक्ष
यह छंद मेरा अर्जित प्रसाद
मैं दुनिया से क्या पाऊंगा?
मैं कवि हूं सिर न झुकाऊंगा।