यह प्यारा मधुमय सा संसार
प्रात खोले है मन का द्वार
दिवस भर खुशियों का अंबार
रात को तारों में घर बार।
क्षितिज जब उगता है सोना
नींद छोड़े हैं हर कोना
कूकते कलरव करते खग
किरण से जगमग होता जग।
फूल खिल उठते हैं सारे
अंगड़ाई लेती हैं कलियां
खुशबू फैल रही हर ओर
जहां मदमस्त हो गए मोर।
सुबह की भीगी यह खुशबू
बुलाती मुझको अपने पास
पुष्प पर भ्रमरो की अनुगूंज
लगता है आया ज्यों मधुमास।
फैलती महुए की चादर
टपा टप पेड़ों के नीचे
कभी सरसों के पौधे पर
सज रही धानी सी चुनर।
चकित हो नैनो से देखो
रात को तारों का चितवन
रातरानी की खुशबू में
डूब जाता है सारा वन।
कभी जब पतझड़ आता है
सूख उठती बगिया सारी
सहज ही ऐसा लगता है
प्रकृति मन से है हारी।
तभी डाली के अंतर से
झांकने लगती हरियाली
यही तो आखिर जीवन है
यही सुख दुख का मिश्रण है।
कभी खुशियां ही खुशियां है
कभी सपनों का भंजन है
यहां हरियाली पतझड़ का
एक अनुपम सामंजन है।
कभी हर प्याले में मधु है
कभी साकी ही रूठा है
यहां अगले ही पल क्या हो
किसी ने भी ना देखा है।
यह प्यारा मधुमय सा संसार
प्रात खोले है मन का द्वार
दिवस भर खुशियों का अंबार
रात को तारों में घर बार।