तुम कोई भी स्वप्न देख लो
पर कर्म तो करना पड़ेगा
किसी भी दीप की तरह
हर रात को जलना पड़ेगा।
ये यूं नहीं कि कोई भी
आ कर मिसाल बन गया
ये यूं नहीं कि कोई भी
आ शिखर पर चढ़ गया।
ये यूं है कि दीपक में भी
एक बाती है सदा जली
ये यूं है कि इस राह पर
श्रम से ही मंजिल मिली।
कितने ही लोग कर्मरत
बस स्वेद में पिघल गए
कितने ही अपने कर्म से
यह जिंदगी बदल गए।
बहुत घना तिमिर था वो
पर जुगनू जब चमक उठे
वो रात मुझ्को याद है
जब अंधकार मर गया।
आशा निमित्त मात्र है
एक सोपान कर्मयोग की
कांटे भले हों राह पर
कदम तो रखना पड़ेगा।
तुम कोई भी यत्न देख लो
लक्ष्य तो तभी मिलेगा
जगनुओं की ही तरह
मशाल बन जलना पड़ेगा।