वह दीपक मुझे बुलाता है
विकराल तिमिर के बिंब बीच
मुझको लड़ना सिखलाता है
वह मुझमें आस जगाता है
वह दीपक मुझे बुलाता है।
कैसे एक जरा सी लौ
लड़ती घनघोर अंधेरे से?
दृढ़ निश्चय की बाती पर
अपने कदम टिकाता है
वह दीपक मुझे बुलाता है।
मुझमें है उसका अंश कोई
मेरा उससे संबंध कोई
जब स्वप्नों का हो अनस्तित्व
वह मुझमें स्वप्न जगाता है
वह दीपक मुझे बुलाता है।
निश्चित है लड़ना होगा ही
जब भी कोई निःशब्द हुआ
कोई बेड़ी में जकड़ा हो
कोई निर्बल थर्राता है
वह दीपक मुझे बुलाता है।
चल देता हूं निर्भय होकर
उस मरू के सूनेपन में भी
हो धूप जल रही, आंधी हो
वह मुझमें लय हो जाता है
वह दीपक मुझे बुलाता है।
उठो, जगो, संघर्ष करो
बाधाओं पर मत ध्यान धरो
तम के घोर अंधेरे से
भाग मनुज कब पाता है?
वह दीपक मुझे बुलाता है।
टकराओ तुम बार बार
अंधियारे के मद छल से
यत्न बहुत करने होंगे
फिर नया सवेरा आता है
वह दीपक मुझे बुलाता है।
वह दीपक मुझे बुलाता है
विकराल तिमिर के बिंब बीच
वह मुझमें प्यास जगाता है
मुझको लड़ना सिखलाता है
वह दीपक मुझे बुलाता है।