समय के वेग में यूं बढ़ गए कदम
याद ही ना रहा प्रेम कहना है कब
तुम सामने से कुछ यूं ओझल हुए
होश ही ना रहा संजोना है कब?
वश में था ही नहीं थाम लें वक्त को
मांग लें, गढ़ ही लें मुकद्दर नया
रोक लें हम तुम्हें भर के आगोश में
था पता ही नहीं दूर होना है क्या?
ओस का ओज ज्यो घास में बुझ गया
जैसे थम सा गया समंदर कोई
फूल की डाल से पुष्प जैसे गिरे
टूट गिरता है ज्यों तेज तारा कोई।
ठीक वैसे गए तुम मुझे छोड़ कर
यह लगा ही नहीं कि मिलोगे नहीं
जाने किसने रची थी वो काली घड़ी
प्रेम की मंजरी रह गई चुप खड़ी।
आज हम दूर हैं, तुम भी स्मृति शेष हो
देखते हैं तुम्हें मन के आगोश में
पूछते हैं प्रभु तुमने ये क्या किया
हम तो नादान थे, तुम तो सब जानते?
कोई कहता है रहते हो ऊपर कहीं
फैली रहती जहां हर तरफ चांदनी
कोई कहता है ईश्वर के तुम पास हो
जिस जगह अंत होता है सारा गगन।
प्रेम के सामने क्या है जीवन मरण
प्रेम को छोड़कर और क्या हसरतें?
प्रेम के सामने क्या है अट्टालिका
प्रेम में ही जीवन, प्रेम में ही मरण।
दूर नीचे कहीं टिमटिमाती धरा
चैन कैसे रहे, प्रेम में जो पड़ा?
यहां कितने महीने गुजर भी गए
वहां स्वर्ग में सिर्फ दो दिन हुए।
समय में समय का यह अंतर बड़ा
कि पतझड़ यहां अंत ही ना हुआ
सिर्फ आभास था तुम मुझे सुन रहे
हो द्रवित भाव से तुम मुझे गुन रहे।
सामने फूल पर कुछ बूंदे गिरी
जाने क्यों यह लगा अश्रु हैं तेरे क्या?
झोंके सी जो हवा मंद बहने लगी
गेसू को वेग से कुछ हटाया है क्या?
दीखती हैं मुझे भीगी आंखें तेरी
नेह के अश्रु से कुछ बोझिल हुई
खोजती लांघती बीच के व्योम को
स्वर्ग में क्या हुआ, रह गई क्या कमी?
प्रभु कम तो करो दूरियां दरमियां
रंग भरने का बस एक लम्हा तो दो
वक्त थम जाए गर तो क्या खूब हो
हम दोनों मिलें और बरसात हो।
सामने फिर वही नीला आकाश हो
उमंगो का फिर नया मधुमास हो
पूर्णता हो, मिलन हो, नई शुरुआत हो
आत्मा बनकर अमरता का अरदास हो।