जिंदगी के सफर में कोई रात दिन
काम करता रहा कोई सोता रहा
मंजिलों ने स्वयं चुन लिया रास्ता
कोई पाता रहा कोई खोता रहा।
सदा प्यास चलकर कुएँ तक गई
सदा कोशिशें बन गई रोशनी
सदा कर्म को ही मिली मंजिले
कोई जगता रहा कोई सोता रहा।
जो सदा कंटको से उलझता रहा
वह इबारत नई एक लिखता रहा
सफर की थकन जिसने माना नहीं
वह सदा ही शिखर पर पहुंचता रहा।
आशा निराशा के सोपान कितने
यूं आकर मनुज को तराशा करें
जिंदगी को निभाना बड़ी बात है
कोई पाता रहा कोई खोता रहा।
जैसे मूरत कोई रोज बनती रही
श्रम की छेनी से सूरत निखरती रही
ठीक वैसे ही हाथों से किस्मत सजी
कोई रचता रहा कोई रोता रहा।
जिंदगी के सफर में कोई रात दिन
काम करता रहा कोई सोता रहा
मंजिलों ने स्वयं चुन लिया रास्ता
कोई पाता रहा कोई खोता रहा।