अभी-अभी स्नातकोत्तर अंग्रेजी की कक्षा से ग्रीक दार्शनिक एवं आलोचक लोंजाइनस की सब्लाइम थ्योरी पढ़ा कर लौटा था। सब्लिमिटी की व्याख्या करते समय मैंने उनसे कुछ शब्दजालों की बात की जो अक्सर आलोचक दे दिया करते हैं और फिर उस पर लंबी लंबी बहस और चर्चाएं शुरू हो जाती है। लोंजाइनस अलंकार शास्त्र में सब्लाइम के द्वारा एक ऐसी स्थिति को परिभाषित कर रहा था जब भाषा एक ऐसे स्तर पर पहुंच जाए जहां पर उसकी प्रतिष्ठा करने की इच्छा करे और वह लोगों के विचार को एक उच्च स्तर प्रदान करे। चुंकी यह अवधारणा साहित्य के संदर्भ में पूरी तरह अस्पष्ट मालूम होती है अंतः मैंने छात्रों को उसे भारतीय रस निष्पत्ति सिद्धांत से जोड़कर तुलनात्मक रूप से समझने का सुझाव दिया। तभी मेरे अति जिज्ञासु छात्र सागर पांडेय ने वहां आकर मुझ पर एक नया सवाल दाग दिया।
“सर, आजकल जो राजनीतिक चर्चाओं में विश्वगुरु बनने और अमृतकाल की चर्चा होती है, इनका क्या अर्थ है, क्या ये दोनों शब्द भी विचार की किसी ऊंचाई को दर्शाते हैं?”
मैं निरुत्तर था और मेरे पास इस प्रश्न का कोई जवाब फिलहाल नहीं था, मैंने अगले दिन इसके बारे में उससे चर्चा करने की बात की। उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि मुझे भी इन दोनों शब्दों का अर्थ और संदर्भ आज तक समझ में नहीं आया था । भूमंडलीकरण के दौर और डिजिटल क्रांति के युग में विश्वगुरु? कैसे? एक ओर जब नई शिक्षा नीति के कारण ज्ञान की सारी परंपराएं एक साथ मिल गई हों और हमारी नई नस्ल उन सब पर सम्यक रूप से विचार करते हुए आगे बढ़ रही हो और अपने को बदल रही हो, फिर आज के युग में विश्वगुरु होना, क्या यह संभव है? फिर अमृतकाल को तो समझना और भी दुरुह है। क्या कभी ऐसा काल भारत के इतिहास में रहा है? आज तो हम विभिन्न तकनीकी वस्तुओं के लिए विश्व के अन्य देशों पर निर्भर है? इन प्रश्नों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था, सोचा, शाम को अपने मित्र पंडित वासुदेव त्रिपाठी से इस पर चर्चा कर लूंगा, शायद कुछ संदर्भ मिल जाए क्योंकि मैं उन्हें तत्वज्ञानी मानता था।
शाम को उनसे वार्तालाप के दौरान कोई मसला हल न हुआ, न कोई संदर्भ ही मिला, वह मेरे प्रश्नों पर मुस्कुरा रहे थे लेकिन हंसते हंसते उन्होंने आजकल विश्वविद्यालयों की स्थिति की ओर एक इशारा कर दिया जो विश्वगुरु की शाब्दिक परिभाषा से बिल्कुल विपरीत जान पडता था। विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रधान पूरी तरह निरंकुश हो चुके थे, वहां संवादहीनता की स्थिति ने अपना घर बना लिया था, शिक्षकों की कोई सुनने वाला नहीं था, उनसे दुर्व्यवहार की गाहे-बगाहे सूचना मिल रही थी, और विद्यार्थियों की तो बात ही छोड़ दीजिए। बहुत सारे पाठ्यक्रम बिना शिक्षकों के चलने शुरू हुए थे, कुछ कुछ नए स्टार्टपों की तरह जिनका कोई आधार ही नहीं था। नियुक्तियां भी मनमाने तरीके से चल रही थीं । सभी जांचें उनके सामने बेकार हो चली थीं और वे जगह-जगह बड़े लोगों के साथ खड़े नजर आ रहे थे। जो भी कुछ आवाज बुलंद करता उन पर जांच बिठा कर सस्पेंड कर दिया जाता। समस्त अधिनियम ताक पर रखकर कार्य हो रहे थे और स्टेकहोल्डर्स की नाराजगी का कोई महत्व नहीं रह गया था । जहां तक अमृतकाल की बात थी, वह तो इस महंगाई के दौरान पूरी तरह गलत जान पड़ती थी, तो क्या इन दोनों शब्दों का अर्थ विपरीत ही मान लिया जाए, यह प्रश्न अपने आप में एक पहेली की तरह की तरह मेरे सामने जस का तस था। अपनी चर्चा में पंडित वासुदेव त्रिपाठी ने इन शब्दों का संदर्भ लोक कहानियां और लोकाचार में ढूंढने का सुझाव दिया था परंतु मैं साहित्य का विद्यार्थी था, कोई समाजशास्त्री तो था नहीं, अतः भटकाव और उलझाव की एक मृग मरीचिका मेरे सामने थी।
दो-तीन दिन बीतने के पश्चात अचानक मेरे मस्तिष्क में मेरे गांव के ही स्वर्गीय गजाधर मिश्र का प्रतिबिंब सामने आ गया और मेरे गांव की एक घटना ने मेरा ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। पंडित गजाधर मिश्र संस्कृत के पंडित बिल्कुल नहीं थे, यह बात और थी उन्होंने पास के ही कस्बे बैकुंठपुर (देवरिया) के संस्कृत विद्यालय में दस-बारह दिन पढ़ाई की थी और इस कारण संबोधन में उनके नाम में पंडित जुड़ गया था। वस्तुतः वह एक भैंस पालते थे और उनका पूरा दिन चरागाह में ही बीतता था, हां कभी-कभी संस्कृत विद्यालय से पाई गई कुछ पुस्तकें अपने हाथ में रखते और भैंस की पीठ पर बैठे-बैठे अध्ययन की मुद्रा में दिखाई देते। इतना करने के बाद भी उनके ज्ञान पर गांव वालों को जरा भी विश्वास नहीं था। तभी अचानक गांव वालों के सामने एक ऐसा प्रश्न खड़ा हुआ जिससे पूरे गांव की प्रतिष्ठा जुड़ी हुई थी। उस समय बारात में मर्याद रहने का प्रचलन था और मर्याद के दिन जनवासा हुआ करता था जिसमें दोनों तरफ के पंडित अपने-अपने शब्द बाण लेकर शास्त्रार्थ की मुद्रा में मंगल बोलते और एक दूसरे पर कटाक्ष करते, कुछ हंसी मजाक भी होता रहता। अगले कुछ दिनों में मेरे गांव में एक बारात आने वाली थी जिसमें दूल्हे का परिवार पंडितों के खानदान से था जो बनारस जाकर बस गया था। यह जाहिर था कि उसमें बड़े-बड़े बनारसी पंडित आने वाले थे अतः शास्त्रार्थ के लिए हमारी तरफ से भी अच्छे पंडितों की आवश्यकता थी, नहीं तो गांव की नाक कट जाती। इत्तेफाक से उस समय गांव की क्या कहें, गांव के आसपास के भी पंडित व्यस्त थे और कोई उस दिन उपलब्ध नहीं था। अतः गांव की हार निश्चित थी। गांव के बड़े बूढ़े बड़े परेशान थे और इस समय उनको अपने तारणहार के रूप में पंडित गजाधर मिश्र के अलावा कोई नजर नहीं आ रहा था। जनवासे का समय आ पहुंचा, उन्होंने पंडित गजाधर मिश्र को जैसे तैसे कुर्ता धोती पहना कर, तिलक त्रिपुंड लगाकर तैयार किया, केवल यह कह कर कि, “तु खाली मंगल बोल दीहऽ, बाकी हमहन देख लिहल जाई”।
गांव से सभी नौजवानों, बच्चों और बड़ों को उस जनवासे में मौजूद रहने का हुक्म सुना दिया गया और सभी निर्धारित समय पर वहां पहुंच गए।
खैर, जनवासा प्रारंभ हुआ, एक बड़ा सा शामियाना तना हुआ था और इत्र वाले कामदार गुलाब जल डालकर अपने हाथों से दाएं बाएं छिड़क रहे थे। पूरा माहौल जैसे बादशाहों के जमाने में पहुंच गया था और दोनों तरफ के वक्ता अपने तीर कमान लेकर वहां मौजूद थे जैसे युद्ध के मैदान में दोनों सेनाएं आमने सामने खड़ी हों, परंतु मेरे गांव वालों की पेशानी पर बल पड़े हुए थे। माहौल बड़ा गंभीर था। सर्वप्रथम वर पक्ष के प्रधान पंडित ने मंगलाचरण की शुरुआत की और वर पक्ष की ओर से उनकी प्रशंसा होने लगी। उनका मंगलाचरण भी बहुत लंबा था जैसे वह उसमें अपना पूरा पांडित्य प्रस्तुत कर देना चाहते थे। अब बारी पंडित गजाधर मिश्र की थी, वह खड़े हुए और बहुत जोर से मंगल बोलना शुरु कर दिया:
“अखंड मंडलाकारम व्याप्तं येनचराचरम्
नैनम दहति पावक:, तुमहु बंदउ विश्वगुरुम”
उनके मंगल बोलते ही वर पक्ष में जैसे शोर मच गया, विरोधी पक्ष के पंडितों ने बीच में रोककर उन्हें डांटा!
“किम अशुद्धम वदसि?”
पंडित गजाधर मिश्र बिना एक पल विलंब किए उनसे शास्त्रार्थ में लग गए जैसे इस प्रश्न की तो उन्होंने पूर्व में ही कल्पना कर ली थी, और जवाब तैयार था।
“एक्के अशुद्धम में परास्त भवतम, हम ऐसा ऐसा अशुद्धम रोज रोज कर्तम” ।
सारे बनारसी आवाक, उन्होंने कभी ऐसे प्रत्युत्तर की कल्पना तक नहीं की थी।
पीछे से ग्रामीणों का शोर गूंजने लगा, “जीत गए, जीत गए, जीत गए” क्योंकि इस उत्तर का तोड़ उन विद्वान पंडितों के पास नहीं था। वे सभी हताश होकर वहां खड़े थे क्योंकि उनका ज्ञान और आचरण आज पंडित गजाधर मिश्र के “लवेद” के सामने हार चुका था।
पंडित गजाधर मिश्र पर जैसे पुष्प वर्षा होने लगी क्योंकि वह शास्त्रार्थ के विश्वगुरु बनकर उभरे थे जिसमें बस जीतना महत्वपूर्ण था। मेरा गांव इस समय उस अमृतकाल को जी रहा था जिसमें ज्ञान और तर्क की महत्ता खत्म हो चुकी थी और धूर्तता का साम्राज्य स्थापित हो चुका था। पंडित गजाधर मिश्र परिक्षेत्र के पहले विश्वगुरु थे क्योंकि उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी थी। इस कहानी के स्मरण ने मुझे यह बता दिया कि विश्वगुरु और अमृतकाल जैसे बड़े-बड़े शब्दों के पीछे का रहस्य लोकाचार के अध्याय “लवेद” में छुपा हुआ है और उनके पर्यायवाची शब्द “शठ” या “धूर्त” के नजदीक हो सकते हैं। मेरे ग्राम वासियों के चेहरे उन ज्ञान विशारद प्रोफेसरों से मिलने लगे थे जो विश्वविद्यालय में रहकर सिर्फ वाह वाह किया करते हैं। अमृतकाल की प्रथम तपस्थली मेरा गांव ही रहा होगा जब पंडित गजाधर मिश्र ने पहली बार अपना नया स्टार्टप प्रारंभ करने का सोचा होगा और बाद में व्यवसाय बढ़ने पर अन्य शहरों में फ्रेंचाइजी खोल लिया होगा। हां, उनके शिष्यों का नाम अभी गुप्त रख देता हूं, किसी और दिन विस्तार से चर्चा होगी। मेरी सारी जिज्ञासा शांत हो चुकी थी और साथ-साथ यह प्रसन्नता भी हो रही थी कि विश्वगुरु उपाधिलब्ध प्रथम महापुरुष मेरे गांव के ही थे। मैंने विनम्र होकर उनकी स्मृति को नमन किया और धन्यवाद ज्ञापित किया की अब मुझे अपने छात्र से विस्तार पूर्वक चर्चा करने की सामग्री मिल गई थी। जिन प्रश्नों का उत्तर मैं वेदों, पुराणों, ग्रीस और यूरोप में ढूंढ रहा था उनके उत्तर तो मेरे गांव में ही मिल गए थे भले ही मेरा गांव गूगल मैप्स पर कहीं भी चिन्हित नहीं था।