कल स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष के छात्र सागर पांडेय के एक प्रश्न ने मुझे चौंका दिया। उसने पूछा, “सर, लॉर्ड मैकाले की मिनट तो अठारह सौ पैंतीस की है, फिर आज भी लोग उस को बुरा भला क्यों कहते हैं, क्या वह अभी भी कोई भूमिका निभा कर रहा है अपनी शिक्षा नीति में?” अचानक पूछे गए प्रश्न से मैं थोड़ा चिंतित तो हुआ लेकिन मुझे उसकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए कुछ तो कहना था। अतः मैंने उससे कहा, “अब यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं रह गया है कि लॉर्ड मेकॉले ने हमारे लिए क्या लिखा है, अब तो यह महत्वपूर्ण है कि हम आज अपने लिए क्या कर रहे हैं? अपनी भाषाओं पर हमने स्वयं ध्यान नहीं दिया। आज जो हिंदी की दुर्दशा है उसके लिए मेकॉले जिम्मेदार नहीं, उसके लिए तो हम स्वयं जिम्मेदार हैं। हमने स्वतंत्रता के बाद पब्लिक और प्राइवेट दोनों तरह के स्कूल वैसे ही चलने दिए, उन दोनों में शिक्षा व्यवस्था एवं आधारभूत संरचनाओं का जो अंतर था वह आज भी बना हुआ है। हमारे सरकारी स्कूल अभी भी उनसे बहुत पीछे हैं, तुम कूपमंडूकों की बात मत सुना करो।”
मेरी अचानक दिए गए जवाब से वह संतुष्ट हो गया परंतु कक्षा खत्म होने के बाद मैं सोचने लगा कि आखिर इस भ्रामक प्रचार का कारण क्या है? हम यह क्यों नहीं स्वीकार लेते कि उन्नीस सौ सैंतालीस के बाद से ही हमारा भविष्य हमारे हाथ में है और अगर आज पचहत्तर साल बीतने के बाद भी हम भाषा के स्तर पर अपने इच्छित लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए हैं तो दोष हमारा है, मैकाले का नहीं। आप स्नातकोत्तर के भी छात्रों को हिंदी में एक पन्ना लिखने को दे दीजिए, मेरा दावा है कि उसमें चार-पांच अशुद्धियां अवश्य निकल जाएंगी, स्नातक और इंटरमीडिएट के छात्रों की तो बात ही छोड़ दीजिए जो अपना विषय भी ठीक से नहीं लिख पाते। यह हम सभी रोज देख रहे हैं परंतु फिर भी इसे ठीक करने की कोई सोच विकसित नहीं हो रही। हिंदी से प्रेम दिखाना और अंग्रेजी वालों को बुरा भला कहना आजकल फैशन में है पर करते कुछ नहीं, शहर के शहर अंग्रेजी के बैनरों से पटे पड़े हैं, भूमंडलीकरण का उत्कर्ष हर तरफ दिखाई दे रहा है।
कूपमंडूकों के जिक्र से अचानक मुझे पिताजी के मित्र प्रो राजपति दीक्षित (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) की याद आने लगी जिन्होंने “मंडूक स्तवन” शीर्षक से एक पुस्तक लिखी थी । उस समय मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर (अंग्रेजी) की कक्षा में प्रवेश लिया था और उसी दिन शाम को उनके घर अपने पिता के साथ गया था। उनका शीर्षक सुनकर मुझे बड़ा अटपटा लगा था परंतु चुंकी वह मेरे पिता और उनके बीच की बात थी, मेरा कुछ कहना आवश्यक नहीं था। और मंडूकों की स्तुति, क्यों भला? यह तो कोई सोच भी नहीं सकता था। परंतु आज न जाने क्यों मुझे यह लगने लगा है कि वह बहुत महत्वपूर्ण विषय पर पुस्तक रही होगी क्योंकि उन्होंने पहले ही यह भांप लिया था कि एक दिन यह समय जरूर आएगा। आज कहीं भी चार लोगों से आप किसी तर्क की बात कर लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि कूपमंडूकों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है और हम आप सब उनसे चौतरफा घिर चुके हैं, यहां तक की विश्वविद्यालयों में भी जो ज्ञान के केंद्र माने जाते हैं। अब मंदिर जाने, कथा सुनने एवं पूजा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण फेसबुक पर उसका चित्र डालना हो चला है। यहां तक कि फोटो खिंचवाते समय देवी देवता की ओर भी नहीं देखते, केवल कैमरे पर नजर रहती है। आजकल का नया तीर्थ बागेश्वर धाम है और आप वहां लगती भीड़ देख लीजिए। इसलिए अगर कहीं भी आपको अपने तर्कों का प्रत्युत्तर नकारात्मक मिले तो अल्बर्ट आइंस्टाइन की बात मानकर उन पर ध्यान ही मत दीजिए क्योंकि उनके शब्दों में, “विक पीपल रिवेंज, स्ट्रांग मैन फॉरगिव एंड इंटेलीजेंट पीपल इग्नौर” सबसे सफल सूत्र वाक्य है ।
हां, एक और बात। अभी कुछ दिन पहले अपने गांव गया था जहां कुछ संसद न चलने देने और राजनीति पर चर्चा चल रही थी। मैंने कहा कि अभी हमारा लोकतंत्र इतना परिपक्व नहीं हुआ है और हमें संसद को चलाने में अन्य यूरोपियन देशों से सीखना चाहिए, परंतु जल्दी ही मुझे लगने लगा कि मेरे तर्क आधारित बातों के कारण मैं अकेला पड़ गया हूं और अंधश्रद्धा और अज्ञानता ने बाजी मार ली है। एक सज्जन तो यहां तक कहने लगे कि इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने में भी अपने प्रधानमंत्री जी का हाथ है, और इसरो के अभी-अभी रीयूजेबल लांच वहीकिल बनाने में भी। यह सब उन्हीं के चरण रज का कमाल है। यहां यह सोचने वाली बात अवश्य है कि मंगलयान के प्रक्षेपण के समय भी यह महापुरुष वहां मौजूद थे फिर मार्स रोवर अपने लक्ष्य तक कैसे नहीं पहुंचा? शायद वहां विपक्षी पार्टियों की कोई साजिश रही होगी। अतः मित्रों, अब सावधान रहने की जरूरत है और अपने तर्कों को अपने तक सीमित कर लेने की आवश्यकता है, क्योंकि आजकल हर जगह व्हाट्सप और फेसबुक से ज्ञान की बारिश हो रही है, अन्यथा आपको कब झटका लग जाए, कोई ठिकाना नहीं।
आजादी के पचहत्तर वर्ष बाद जब हमें अपनी वैज्ञानिक सोच एवं तर्कशील चिंतन का विकास करना चाहिए वहां हम तर्क को ताक पर रखकर अंधविश्वास एवं असत्य को बढ़ावा दे रहे हैं। “सा विद्या या विमुक्तये” हमारे कुछ विश्वविद्यालयों का सूत्र वाक्य होने के बाद भी कितनी मुक्ति हो पाई है, और मुक्ति होगी भी कैसे, यह कूपमंडूक कभी भी मुक्ति की इच्छा ही नहीं करता क्योंकि वह अपने पिंजरे से प्रेम करता है, उसे सुंदर मालाओं से सजा कर रखता है और दूसरों से भी अपेक्षा करता है कि वह भी यही करें। अभी हाल में ही किसी ने लिखा था कि अगर कोई आपसे यह कहे कि हाथी उड़ता है तो आप अगले क्षण यह कहें कि “हां, मैंने देखा है, कल ही तो मेरे सामने वाली बिजली के खंभे पर बैठा था।” एक जगह तो और हद हो गई। एक महोदय ने सरेआम मंच पर खड़े होकर कहा कि इस शवदाह गृह के बन जाने से यहां मरने वालों को जलने में कितना मजा आएगा। अगर यह हमारे विमर्श का स्तर है तो आप भी पाप पुण्य जोड़ते हुए अपना समय व्यतीत करें, फल की इच्छा मत करिए, केवल कर्म करते जाइए और वोट देते जाइए। केवल वोट देना ही आपका धर्म है, उसके बाद कुछ अपेक्षा मत करिए। अपनी अपनी गाड़ियों के पिछले शीशे पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, यदुवंशी, जलवंशी इत्यादि जाति सूचक शब्द खूब प्रसन्न होकर लिखवाईए और भजन करिए। हमारे नेता आनंदित है कि यह राजनीति के हेतु सामाजिक विभाजन पैदा करने का स्वर्णिम काल है। किसी विचारक ने भारत को “सैलेड बोल” शायद इसीलिए कहा था। यह सत्य भी है क्योंकि यहां “मेल्टिंग पोट” बनने का स्वप्न कभी भी पूरा नहीं हो सकता । जहां स्वतंत्र विचारों की पौध काट दी जा रही हो और कूपमंडूक बनाने का संयंत्र जगह जगह लगाया जा रहा हो, वहां यही संभव है।
अभी कल ही एक अयोध्यावासी संत एक चर्चा में अपनी विरासत की पुनर्प्राप्ति पर बात कर रहे थे, यह बात मुझे अच्छी लगी। चलिए मैकाले और फ्रांस की क्रांति के विचारों को भूलकर कुछ अपनी ही विरासत की चर्चा हम कर लेते हैं। जगतगुरु शंकराचार्य तो याद ही होंगे आपको, उन्होंने शास्त्रार्थ किया था मंडन मिश्र से, मंडल मिश्र हार गए थे तभी मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने उन्हें चुनौती दे डाली। यहां एक महिला से शंकराचार्य का शास्त्रार्थ होना था, और फिर भारती ने उन्हें कुछ स्त्री पुरुष के शारीरिक संबंधों से जुड़े प्रश्न पूछे। शंकराचार्य ब्रह्मचारी थे, उन्हें उत्तर ज्ञात नहीं था परंतु उन्होंने कभी भी यह नहीं कहा कि वह स्त्री से शास्त्रार्थ नहीं करेंगे और इन प्रश्नों को भरी सभा में पूछा जाना वर्जित होना चाहिए। इसका अर्थ है कि शास्त्रार्थ हुआ था और इन प्रश्नों की चर्चा भी हुई थी। शंकराचार्य शास्त्रार्थ में कमजोर पड़ गए, उन्होंने समय मांगा और फिर उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर विजय प्राप्त की। अब दूसरा उद्धरण गुरु अष्टावक्र और राजा जनक के राज्य पुरोहित बंदी का है जो जनक के दरबार में हुआ। अष्टावक्र का शरीर विकलांग था इसके बावजूद जनक ने उनके ज्ञान को प्रतिष्ठा देकर उन्हें राज्य पुरोहित बंदी से शास्त्रार्थ करने की अनुमति दी। गुरु अष्टावक्र विजयी हुए और बंदी ने वचन के अनुसार जीवन त्याग दिया। इन दोनों उदाहरणों में ज्ञान और तर्क की स्थापना का एक अनुपम उदाहरण दिखाई देता है। ज्ञान क्षेत्र की विशालता और तर्क की महत्ता का आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं। यह बात फ्रांसिस बेकन की पुस्तक मेडिटेशनेस सैकरे (1597) मैं लिखी लैटिन भाषा की उक्ति “साइंसिया पोटेंशिया ईस्ट” यानी “ज्ञान ही शक्ति है” से कितनी मिलती जुलती है। आइए कुछ और मान्यताओं पर भी ध्यान दें, जैसे पिता यह सोचता था कि उसका पुत्र उससे ज्ञान में बड़ा हो और यह पिता के लिए मोक्ष की प्राप्ति जैसा था। गुरु यह सोचता था कि उसका शिष्य उसे शास्त्रार्थ में हरा दे। आप स्वयं सोचें कि ज्ञान और तर्क अगर एक व्यक्ति के लिए इतना महत्वपूर्ण है तो एक राष्ट्र के लिए कितना महत्वपूर्ण होना चाहिए। शायद इसीलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि हम अपनी खिड़कियां खुली रखें, ज्ञान कहीं से भी मिले उसे ग्रहण करें और अपने जीवन को सफल बनाएं। हम तो अब खिड़कियों को ही बंद कर दे रहे, और विरोधी का सम्मान तो हम जानते ही नहीं, उसके फेसबुक, व्हाट्सएप और टि्वटर अकाउंट को तो ब्लॉक होना ही है। मुझे शकील बदायूंनी का एक शेर याद आ रहा है जिसकी पंक्तियों में संदेश छुपा है:
मेरा अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है, ये कहीं चमन को जला न दे।
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय ऐसे मेंढक इक्का-दुक्का कभी-कभी या केवल बरसात में ही दिखते थे पर यह अब हर तरफ है, मुझे लगने लगा है की पूरे साल अब बरसात का मौसम चल रहा है। मुझे भय लगने लगा है क्योंकि मैंने कूपमंडूकों की इतनी चर्चा कर दी। अब कान पकड़ता हूं, आगे कुछ नहीं लिखूंगा और गोस्वामी तुलसीदास जी की तरह, “मूंदहु आंख कतहुं कछु नाहीं”, नहीं तो पता नहीं कब मुझे देशद्रोही…। आप भी भूल जाइए कि मैंने क्या कहा।
अरे हां, उनकी स्तुति भी कर लेता हूं:
हे मंडूक देवता,
सब सुख लहै तुम्हारी सरना
जब तुम ज्ञाता काहे को डरना?