जब चलते-चलते रात हुई
इन छालों से कुछ बात हुई
मंजिल का था पता नहीं
कुछ आंखों से बरसात हुई
थक कर बैठा था मनुज मौन
जुगनू बोला रोता है कौन?
छोड़ो तुम सारी चिंताएं
बीता जो कल की बात हुई
आंसू क्यों व्यर्थ बहाते हो
बाधाओं से घबराते हो?
आओ मैं तेरी थकन हरूं
अपने मन कि बात कहूं
रातों के घने अंधेरे में
जब जलता कोई दीप नहीं
पदचिन्हों की हर रेख मौन
किससे पूछेगा राह कौन?
जब तारों पर छाते बादल
तूफान हो गया हो पागल
तब भी आशाएं होती हैं
कुछ मर्यादाएं होती हैं।
जो कर्म करेगा जीतेगा
त्रुटियों से ही तो सीखेगा
चहुं ओर घेरती बाधाएं
फिर भी बनती हैं गाथाएं
तब भी लड़ते हैं कर्मवीर
पर्वत पर चढ़ते शूरवीर
यह तो वीरों का जीवन है
फिर मन में कैसी उलझन है?
मुझको भी तो देख जरा
उन रातों के अंधियारे में
जब सभी सितारे सोते हैं
दीपक सारे बुझ जाते हैं
हर आस हो गई जब ओझल
तारों सा स्वयं चमकता हूं
किरणों की परछाई बन
उम्मीदों की गहराई बन
देखो छाले मुसकाते हैं
आओ फिर कदम बढ़ाते हैं।