फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर से होगी भोर
आस की किरण जगेंगी
मधुमास में चहूं ओर।
रातरानी फिर करेगी
नींद से मुंहजोर
मोगरे पर फिर से होंगे
भ्रमर, रस के चोर।
सुख-दुख लिखे हैं नियति में
ज्यों दिवस में अवसान
रात का होना निरंतर
है सुबह का सम्मान।
सुख परखता आदमी के
कर्म को, संज्ञान को
दुख परखता आत्मबल को
तेज को, अभिमान को।
क्या मनुज जो रो रहा है
अल्प से ठहराव में
क्या मनुज जो दुखी होकर
डूबता अवसाद में।
क्या हुआ जो आज कुछ
अपने निगाहें फिरते हैं
क्या हुआ जो कुछ मनुज
कर्तव्य अपने भूलते हैं?
संघर्ष ही केवल हमारे
मान के हिस्से में है
धैर्य ही केवल हमारे
ज्ञान के हिस्से में है।
देखना एक दिन हमारे
सत्य की ही विजय होगी
देखना एक दिन स्वयं ही
काल चरणों में गिरेगा।
तुम हो मेरे साथ
समय की चाल भी कोई विषय है?
क्या अपव्यय अश्रु का
श्रम सदा से अंतिम निलय है।
फिर खिलेंगे फूल प्रियतम
फिर से होगी भोर
आस की किरण जगेंगी
मधुमास में चहूं ओर।