‘बुडुआ’ भोजपुरी भाषा का शब्द है जो बच्चों को डराने हेतु पूर्वांचल के गांवों में खूब प्रयोग किया जाता है। यह न भूत है न प्रेत है और न जिन्न ही है। यह तालाब के पानी में रहता है और रात को राह चलते राहगीरों को तालाब में डूबा कर मार डालता है। बुडुआ के डुबाए हुए लोग बुडुआ ही बनते हैं और इस तरह उनका समूह बढ़ता रहता है क्योंकि कोई और ऑप्शन है ही नहीं। सहोदर चाचा के अनुसार इनका रंग सफेद होता है। पश्चिमी देशों के बैंपायर या ड्रैकुला इनसे कुछ मिलते जुलते हैं पर वह पानी में नहीं रहते, यह बड़ा अंतर है। अगर आपने बचपन में इनके बारे में नहीं सुना तो या तो आपका जनरल नालेज थोड़ा कमजोर है या गांव में आप कम रहे हैं क्योंकि इसी बुडुआ का भय ही तो बच्चों को तालाब में गहरे जाने या अकेले तैरने से रोकता था। हर मां, बुआ और बड़ी बहन अपने बच्चों और भाइयों को इनके बारे में बताती और आगाह करती, “ताल में मत नहाना, उसमे बुडुआ हैं”। बच्चे अक्सर तालाब के पानी को गौर से देखा करते कि कहीं कोई बुडुआ दिख जाए पर कोई नहीं दिखता, यह अलग बात थी। तभी कोई स्पष्ट करता की बुडुआ दिन में नहीं निकलते और तब जाकर हमारा भय कम होता। बुडुआ से बचने का उपाय एक ही था- गायत्री मंत्र। गायत्री मंत्र हमे कंठस्थ कराया जाता और कभी कभी सुन भी लिया जाता कि हम भूल तो नहीं गए?
उस दिन सहोदर चाचा न जाने कैसे एक बुडुआ की कहानी लेकर शुरू हो गए। यह बुडुआ नामक जंतु से हमारा पहला एनकाउंटर था अतः हम सभी अनजाने भय और आशंका से ग्रस्त होकर कहानी सुनने लगे। कहानी हरि शुक्ल के साथ घटी घटना की थी जो पास में ही रहते थे। हरी शुक्ल की इकलौती बहन की शादी हमारे गांव के दक्षिण ओर बसे गांव डिघवां में हुई थी जो मेरे गांव से करीब चार किलोमीटर दूर है। बीच में एक चौंर है जो दोनों गांवों की विभाजित करती है । गांवों की विभाजन रेखा के पास उसी गांव का एक बड़ा तालाब है जहां भगवान शंकर का अकेला मंदिर अवस्थित है। आस पास कोई बस्ती न होने से यह इलाका अक्सर सुनसान रहता है। उन दिनों में आसपास कुछ चरवाहे अपनी गाय भैंस चराते दिखते थे। मंदिर की घंटियां दिन में कभी कभार बज उठती जब पुजारी पूजा करने लगते पर शाम होने पर वहां कोई नहीं होता क्योंकि रात को पुजारी भी वहां रुकने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। शाम की आरती के पश्चात वहां कोई नहीं होता। अतः पूरा क्षेत्र बुडुओं के हवाले जो रात को अपने परिवार के साथ निकल आते, और न जाने क्या करते?
हम लोगों ने उस तालाब और मंदिर को आते जाते देखा था अतः अपनी कल्पनाओं में सफेद बुडुओं को निकलते और पानी में कलाबाजियां करते देखना कठिन नहीं था। खैर, कहानी आगे बढ़ी जब हरि शुक्ल अपनी युवावस्था में कभी न्योता करने अपनी बहन के यहां गए थे। तिलक का कार्यक्रम था। उन्हें शाम ढलते लौटना भी था क्योंकि यहां घर पर उनके अलावा पुरुष कोई नहीं था। उन दिनों बैलों की चोरियां भी अपने चरम पर थीं। बैल खोलवा गिरोह रात को घूमते रहते और गाहे बगाहे बैलों पर हाथ साफ किया करते। हरि शुक्ल के एक जोड़ी बैल कुछ दिनों पहले ही मांझागढ़ के मेले से आए थे इसलिए वह बहुत चिंतित थे। तिलक में भोजन करते करते रात्रि के साढ़े आठ बज गए थे। उनकी बहन ने उन्हें बहुत रोका पर उन्हें अपने बैलों की चिंता सताए जा रही थी। किसी ने उन्हें जाता देखकर तालाब से दूर वाली पगडंडी पकड़ने को कहा पर हरि शुक्ल को घर पंहुचने की जल्दी थी। जल्दी जल्दी डग भरते हुए वह तालाब के रास्ते चले जा रहे थे। उन्हें अपने गायत्री मंत्र पर पूर्ण विश्वास था। वहां स्थित भगवान शंकर का मंदिर भी उन्हें भरोसा दे रहा था। वह घबरा तो रहे था पर आगे बढ़ते रहे। तभी उन्हें लगा कि कोई उन्हें नाम लेकर पुकार रहा है। सोचा, कोई भ्रम हो सकता है और आगे बढ़ने लगे। फिर वही आवाज उनके कानों में गूंजी, इस बार थोड़ी तेज, लगभग आदेशित करती हुई। वह रुक गए, सोचने लगे, इस समय कौन हो सकता है भला? देखा, सामने कोई सफेद कपड़ों में लिपटी आकृति राह रोके खड़ी है। देखकर जैसे उनकी चीख निकल गई और वह जोर जोर से गायत्री मंत्र का जाप करने लगे। पर यह क्या, वह आकृति भी जोर से गायत्री मंत्र का जाप कर रही थी। कोई परिवर्तन नहीं, वह आकृति उनके सामने जस की तस खड़ी थी। हरि शुक्ल को लगा की यह निश्चित ही कोई बुडूआ है जो तालाब से निकल आया है, पर यह गायत्री मंत्र क्यों पढ़ रहा है, यह उनकी समझ से परे था। वह बुरी तरह डर गए थे और तब उन्होंने गायत्री मंत्र छोड़ कर शिव वंदना करनी शुरू की।
“कर्पूर गौरम करुणावताराम संसारसारम भुजगेन्द्रहारम”
तभी उन्होंने सुना कि वह आकृति भी वही श्लोक बोलने लगी। हरि शुक्ल यह जान गए कि यह निश्चित ही कोई संस्कृत पाठी बुडुआ है और इससे पीछा सिर्फ मंत्र बोलकर नहीं किया जा सकता। वह तेजी से बाईं तरफ शिव मंदिर कि और भागे। घबराहट में उनके हाथ का झोला कहीं गिर गया। मंदिर के कपाट सांकल में एक लकड़ी लगा कर बंद किए गए थे जिसे खोल कर वह अंदर जा पंहुचे और नीचे गिर पड़े। शिवलिंग के पास एक अदना सा दीपक जल रहा था जो रोशनी तो कम दे रहा था पर उनमें हिम्मत और आस जगाने के लिए काफी था।
हरि शुक्ल करीब तीन पहर बीतने तक अंदर ही बैठे रहे क्योंकि बाहर निकलने पर न जाने क्या होता। जोरों की प्यास लग आई थी पर कोई चारा नहीं था। उस आकृति का कहीं कोई नामोनिशान नहीं था। खिड़कियों से भी कोई झांक नहीं रहा था। थोड़ी देर बाद रात का धुंधलका कुछ कम हो आया तो उन्होंने बाहर निकलने का सोचा। पौ फटने वाली थी। डरते डरते मंदिर के कपाट खोले और बाहर निकल पड़े। बिना पीछे की ओर देखे आगे बढ़ने लगे तभी मंदिर से थोड़ी दूर पर फिर वही आकृति उनके सामने आ मिली। हरी शुक्ल और अधिक घबरा गए, उन्हें लगा कि अब कोई चारा नहीं है, यह अवश्य ही आज मुझे डुबा कर बुडुआ बना देगा। मैं अब बच नहीं सकता। पर तभी उसने उनसे कहा, “जाओ, मैं तुम्हें छोड़ता हूं, तुम्हारी मां ने बहुत साल जीवित्पुत्रिका व्रत किया है नहीं तो आज तुम बचते नहीं”। इतना कह कर वह सुबह के कोहरे में कहीं गायब हो गया। तभी तालाब में किसी के कूदने की आवाज आई, “छपाक”! फिर उसके साथ कई और आवाजें जैसे सारा समूह ही ताल में कूद पड़ा हो, “छपाक…छपाक …छपाक”।
सहोदर चाचा के अनुसार यह बुडुआ बहुत पहले इस तालाब में डूब कर मरे उस मंदिर के किसी पुजारी का था जिस कारण वह संस्कृत बोल रहा था। अब शायद वह पुजारी ही वहां के बुडुओं का प्रधान बन गया था।
अगले दिन मिलने पर हम बच्चों ने एक दूसरे को बारी बारी से गायत्री मंत्र पढ़ कर सुनाया जिससे रिवीजन होता रहे और याददाश्त बनी रहे, न जान कब हमें भी इसकी जरूरत पड़ जाए?