पी! पी! पी। पी!…पी! पी। पी!..पी। पी!
सुबह के पांच बज रहे थे, अचानक तीन सीटियां एक साथ बज उठी। शोर हुआ। “पकड़ो, पकड़ो, देखो भाग जा रहा है। “अरे देखो, इधर भी है गन्ने के खेत में। एक नहीं, दो है, उधर देखो, एक उधर भागा जा रहा है।” तीनों मास्टर, मंसाराम पांडे, सहज यादव और चंदू राम सीटी बजाते हुए बोले जा रहे थे। मोबाइल से भागते हुए लोगों की फोटो लेने की कोशिश भी हो रही थी और उनके साथ आए तीनों होमगार्ड खेतों की ओर दौड़ रहे थे। गांव वाले एकाएक चौंक पड़े, इतने सवेरे, क्या हुआ, देखो जरा। बाहर क्या हो रहा है? ग्राम प्रधान बैरिस्टर यादव चिल्ला रहे थे। गांव के कुछ लड़के भी बाहर भागे, कुछ औरतें और बूढ़े भी। सभी को लगा पुलिस आई होगी, पर क्यों आई है , कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
गजाधर पंडित अभी कल ही बनारस से आए थे, और आज सुबह दिव्य निपटान हेतु बैठे ही थे कि उनकी फोटो सहज यादव ने ले ली थी। उनका पारा सातवें आसमान पर था क्योंकि आज उनकी प्रतिष्ठा का हनन हो चुका था । वे आगबबूला, एक हाथ से धोती पकड़े कभी मास्टर सहज यादव और कभी अपने लोटे को देख रहे थे। बनारस में वह दिव्य निपटान के बहुत बड़े पैरोकार थे पर उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि उनके गांव में क्या हो रहा था? उन्होंने चिल्लाकर अपने भतीजे संतोष को पुकारा। गजाधर पंडित की आवाज गूंजते ही गांव के सभी लोग समझ गए, कुछ बवाल हुआ है। आधा गांव खेतों की ओर भागने लगा, वहां मास्टर मंसाराम पांडे, सहज यादव और चंदू राम अपनी अपनी साइकिल पकड़े चुपचाप खड़े थे। उनके साथ आए तीनों होमगार्डों का कहीं पता नहीं था। वे समझ गए कि अति उत्साह में वे लोग एक बहुत बड़ी मुसीबत में आकर फंस चुके थे। बीएसए साहब ने निर्देश देकर, ओडीएफ का महत्व समझा कर उन्हें यहां भेज तो दिया, पर अब उनकी खैर नहीं थी। भागने का भी कोई फायदा नहीं क्योंकि यह रास्ता गांव के बाहर गांव के ही लोगों के घोठे से होकर निकलता था। शोर सुनकर उन्हें वह वहां पकड़ लेंगे, उन्हें पक्का यकीन था। जैसे तैसे गजाधर पंडित ने अपनी धोती बांधी और तेज गति से उनकी ओर चले जैसे मार ही डालेंगे। मास्टर मंसाराम को अभी भी बीएसए साहब के द्वारा ब्लॉक संसाधन केंद्र औरा-चौरी पर बोले हुए शब्द याद आ रहे थे, “देखिए यह सीटी ले लीजिए, सभी के पास एक सीटी रहेगी, जहां कहीं भी आपके एलॉटेड गांव है, वहां आपको यह काम त्वरित रूप से रोज करना है, जिलाधिकारी महोदय का स्पष्ट आदेश है, जो कोई भी खुले में शौच कर रहा है, फोटो खींच लीजिए, पांच का जुर्माना लगा दीजिए, कोई परेशानी नहीं होगी, आदि आदि” पर उस पूरे वक्तव्य में इस नई परिस्थिति से निपटने का कोई उपाय वर्णित नहीं था।
उनके मोबाइल छीन लिए गए, साइकिल जब्त हो गई और वे तीनों लगभग धकियाए जाते हुए गांव के भीतर ले जाए गए, कुछ लोग उन्हें पहचानने भी लगे, “अरे यह तो बैतालपुर स्कूल के मास्टर हैं, ई यहां का कर कर रहे?” प्रधान बैरिस्टर यादव के अहाते में सारा गांव इकट्ठा हो रहा था, दालान के कोने पर किसी पार्टी का झंडा लहरा रहा था, किनारे सफेद फॉर्च्यूनर और एक काले रंग की स्कार्पियो अपने होने पर इतरा रही थीं । तीनों मास्टर चुप थे, उन्हें लग रहा था कि अब तो भगवान ही उन्हें बचा सकता है। कुछ बच्चे उन पर हंस रहे थे, औरतें उलाहना दे रही थीं और बड़े बूढ़े उनकी बुद्धि और विवेक पर प्रश्न उठा रहे थे। कुछ औरतें तो उन्हें मारने तक की बातें कह रही थीं । सारे गांव के सामने वे तीनों अपराधी बनकर खड़े थे। माना काटो तो खून नहीं, उनकी बात कोई सुनने वाला नहीं था कि यह सब बीएसए साहब का किया धरा है, जिलाधिकारी महोदय का आदेश है और प्रधानमंत्री जी का स्वप्न है कि हर गांव ओडीएफ होने का प्रमाण पत्र दे। गजाधर पंडित आते ही गरज पड़े, “का हो प्रधान, ई का करावत हव?” प्रधान कुछ न बोले, उन्हें कुर्सी दी। गजाधर पंडित जान चुके थे कि वह तीनों शिक्षक हैं, उनसे पूछा, आप तीनो लोग मास्टर हैं तो गांव में क्या कर रहे हैं? मंसाराम पांडे ने सफाई दी कि वे सभी बीएसए साहब के निर्देश पर यहां है, हर गांव को ओडीएफ करना है।
“का कह रहे हैं, ओडीएफ माने का?”
“ओपन डिफेकेशन फ्री, माने यही कि अब बाहर शौच हेतु कोई नहीं जाएगा”
“का बोले, शौच हेतु कोई नहीं जाएगा?”
“माने काहे?”
“प्रधानमंत्री जी बोले हैं कि जब हम शौचालय बनवा दिए हैं तो बाहर लोग न जाएं?” मास्टर सहज यादव ने सफाई दी।
“प्रधानमंत्री जी जो बोलते हैं सब होईए जाता है का?”
“हम तो दिन रात बनारसे रहते हैं, का बनारस में हो गया है?”
“और हमारा फोटो काहे खींचे?”
“संतोष देख तो मोबाइल कहां है?” उन्होंने संतोष की ओर इशारा किया। संतोष ने मास्टर सहज यादव का मोबाइल ले लिया और उन्होंने जो फोटो खींचा था. उसे तलाशने लगा। देखा तो कहीं कोई फोटो नहीं था। संतोष ने पूछा “फोटो डिलीट कर दिए का मास्टर साहब?” मास्टर सहज यादव की जान में जान आई, कहें कैसे कि उन्हें फोटो खींचने नहीं आती। हां, एक बार जरूर उनके पोते ने फोटो खींचना सिखाया था पर वह भूल चुके थे, उन्हें मोबाइल के सारे बटन एक से लगते थे। “कौनों फोटो तो नहीं दिख रहा”, संतोष ने गजाधर पंडित को बताया। गजाधर पंडित भी मन ही मन प्रसन्न हुए कि उनकी लाज बच गई थी, पर उनकी नाराजगी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। बोले, “हमारे सारे धर्म शास्त्रों में शौच करने घर से दूर जाने का नियम है। माना कि मोदी जी ठीक हैं, काम कर रहे हैं पर यह हमारे गांव-घर में उनका दखल देना बिल्कुल ठीक नहीं। बहुत सारी औरतें भी सुबह जाती है, और दिव्य निपटान के भी तो अपने फायदे हैं, इससे पेट साफ होता है, हवा साफ खुलती है और इसी बहाने थोड़ी बहुत टहलान भी हो जाती है”।
प्रधान बैरिस्टर यादव उनकी हां में हां मिला रहे थे, पहली बार गांव के दो विरोधी परिवार इस मुद्दे पर एक साथ हो गए थे, लेकिन उनकी नाराजगी भी कम नहीं थी। उन्होंने सहज यादव से पूछा, “का मास्टर साहब, मोदी जी के सब कार्यक्रम बैरिस्टरे यादव के प्रधानी वाला गांव में, कवनो और गांव नाहीं मिलल? और हमरे गांव में आने से पहले सूचित काहे नहीं किया गया? प्रधान का पावर जानते हैं कि नहीं?” उन्हें डर था कि अगर कोई आकर उनके द्वारा बनवाए गए शौचालयों का चित्र खींचकर भेज देगा तो वह बड़ी परेशानी में फंस सकते हैं। अभी-अभी तो उन्होंने निर्माण विभाग के अधिकारियों के साथ अपना मामला सेटल किया था। प्रधान के प्रश्न का मास्टर सहज यादव के पास कोई जवाब नहीं था, कैसे कहते कि यह हमारा एलॉटेड गांव है, अतः चुप रहना बेहतर समझा। उधर मास्टर चंदू राम चुपचाप मास्टर मंसाराम पांडे और सहज यादव के चेहरे की ओर देख रहे थे। इत्तेफाक से वह नए-नए आए थे, उन्हें कोई पहचान तो नहीं रहा था परंतु वह मन ही मन वह अपने शिक्षक होने के धर्म, इन अजब-गजब परिस्थितियों एवं अपने छात्र छात्राओं के प्रति कर्तव्य पर कुछ सोच रहे थे। वह अपने आप से भी यह प्रश्न कर रहे थे कि आज मेरा विद्यालय बंद रहेगा, विद्यालय के तीनों के तीनों शिक्षक यहां है, ऐसे समय में मेरे छात्र एवं छात्राएं क्या कर रहे होंगे, उनका पठन-पाठन? उन्होंने गांव के शौचालयों की स्थिति देखी, किसी शौचालय में पानी की व्यवस्था नहीं थी, कुछ में छप्पर नहीं और कुछ में भूसा भरा हुआ था। एक-आध मैं बोरे के परदे लटके थे, आगे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं थी।
अंततः कुछ समय के बाद तीनों शिक्षकों को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया कि अगर फिर किसी दिन गांव में दिखाई दिए तो आपकी खैर नहीं। मास्टर मंसाराम अपनी टीम के साथ साइकिल पर सवार होकर गांव से बाहर निकल आए। सोचने लगे कि अब मैं बीएसए साहब को क्या जवाब दूंगा? एक फर्लांग आगे रुक कर उन्होंने पसीना पोछा और सहज यादव से बोले, “बीएसए साहब को फोन करके स्थिति बता दें? शायद इस काम से मुक्ति मिल जाए?” मास्टर सहज यादव ने हां में हां मिलाया। फोन मिलाया गया, पर बीएसए साहब आग बबूला हो गए, “ऐसे नहीं चलेगा, मैं सब समझ रहा हूं, आप लोग काम नहीं करना चाहते, कल से आप लोग सभी अपने अपने एलॉटेड गांव से प्रातः पांच से लेकर छ: के बीच में अपनी लाइव लोकेशन व्हाट्सएप पर शेयर करेंगे और खेतों और बगीचों का चित्र भी पोस्ट करेंगे कि वहां कोई नहीं बैठा है।” मास्टर मंसाराम पांडे और मास्टर सहज यादव परेशान हो उठे, अगले साल ही दोनों की रिटायरमेंट थी, लग रहा था रिटायरमेंट के पहले ही नौकरी चली जाएगी। मास्टर चंदू मंद मंद मुस्कुरा रहे थे, उन्हें देखकर दोनों वरिष्ठ शिक्षक नाराज हो उठे, “अरे भाई, क्यों मुस्कुरा रहे है, इतनी कठिन परिस्थिति है? मास्टर चंदू राम कुछ न बोले, उन्होंने कल सुबह बिलरिया गांव के द्वार पर मिलने का वादा किया और घर चले गए।
अगली सुबह तीनों शिक्षक बिलरिया गांव के बाहर खड़े थे, मास्टर चंदू राम के चेहरे पर मुस्कान थी। बारी बारी से तीनों ने एक खाली खेत की ओर इशारा करते हुए तस्वीर खिंचाई और बीएसए साहब को पोस्ट कर दिया। उस चित्र में दूर-दूर तक कोई दिव्य निपटान करता हुआ नजर नहीं आ रहा था। इसी तरह धीरे-धीरे अन्य गांव भी ओडीएफ होने लगे, प्रधानमंत्री जी के मिशन से जुड़ने लगे, न भारतीय संस्कृति को कोई खतरा था और न स्वच्छ भारत अभियान को, बरिस्टर यादव के बनवाए हुए शौचालयों को भी कोई खतरा नहीं था क्योंकि एक-दो दिनों में ही उन्होंने अपने सारे बिल विभाग से पास कर लिए थे। इन तीनों शिक्षक का अपना विद्यालय छोड़कर यहां होना, यह तो कोई मसला ही नहीं था। जो कार्य सिर्फ शिक्षा से संभव हो सकता था उनकी अन्य तरीकों से खानापूर्ति हो रही थी और छात्र-छात्राओं के अधिकार इन आदेशों के आगे महत्वहीन हो चले थे। अंततः बिलरिया आदर्श ग्राम घोषित हो चुका था।